Posts
Showing posts from March, 2017
प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी कण कण में वो बसने वाला सकल सृष्टि को रचने वाला राम रहीम वो भेजने वाला पैगम्बर का वो ऊपर वाला देवी देव जिसको है भजते भगवानों का भी वो रखवाला वीरों पीरों का जो पूज्नीय एक ईश्वर वो अल्लाह ताला साकार निराकार वो निर्विकार अकाल पुरुख परमेश्वर आला हर प्राणी में अंश है जिसका करुणासिन्धु वो ही कृपाला न्यायप्रिये सत्य प्रेम रंग में सदा सदा वो रहने वाला मानव उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना चाहे उससे वो व्यवहार निराला करे वही जो औरों से चाहे खुद मन को बनाये पवित्र शिवाला आदर सत्कार करें हम सबसे हृदय प्रेम का रहे सदा उजाला कर्म करें सत्य समर्पित होकर लोचन दर्शन मन मोहने वाला सर्वज्ञ सर्वव्यापक सर्वशक्तिमान एक मात्र कर्मफल को देने वाला जीवन के सारे संसाधन प्रकृति में निश्चित मनुष्य को करने वाला सुख दुःख अपने कर्मो का फल शूली को शूल कर देने वाला बन्ध जाता निःस्वर्थ प्रेम में पत्थर में भी प्रकट होने वाला सूफी के सरगम की खुश्बू वो मीरा के शब्दों की माला करे वन्दना साँझ सवेरे हम दृष्टि दया की रखे दीनदयाला करें प्रेम हम हर प्राणी से ही सभी में तेरा अंश निराला जाने माने और प्यार करे हम एक ही शक्ति का नूर निराला धर्म जाति क्षेत्र से ऊपर है ईश प्रेम का दीप उजाला करें नमन हम सतत चरणों में वहती जहाँ सत्य प्रेम की धारा करें ज्ञान से खुद को प्रज्ज्वलित जय जय जय हे दीन दयाला 🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
- Get link
- X
- Other Apps
*_प्रभु कहते हैं_* *अगर मैं तुम्हारी प्रार्थना का* *तुरन्त जबाव दे देता हूँ* *तो मैं तुम्हारे विश्वास को* *और पक्का करता हूँ ।* 💐💐 *अगर मैं तुम्हारी प्रार्थना* *का तुरन्त जबाव नहीं देता हूँ* *तो मैं तुम्हारे धैर्य की* *परीक्षा लेता हूँ...* 🌷🌷 *अगर मैं तुम्हारी प्रार्थना का* *बिल्कुल भी जवाब नही* *देता हूँ तो.....* *मैने तुम्हारे लिये कुछ और* *ही अच्छा सोच* *रखा है |* 🔆🔅🔆🔅🔆🔅🔆🔅🔆🔅 *सुप्रभात* 🌞🌞🌞 🙏🙏 *आपका दिन शुभ हो*🙏🙏
- Get link
- X
- Other Apps
प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी न ही नर है न वो नारी है शक्ति तो मात्र शक्ति है किन्तु अपूर्ण बिन आकार बनता यही दरश आधार बिन दर्शन नहीं पूरी आस बिना मिलन अपूर्ण है प्यास तभी प्रतिक बने जगत में जो आधार हृदय अभिलाष मानव निज स्वार्थ के कारण उलझ चुका जकड़ मोहपाश जहाँ हो जाये मनोरथ पूरे मनुष्य वही सीमित हो जाता सत्य न जाने न खुद को पहचाने स्वार्थ पूर्ति में वो भटक जाता रंग रूप यश धन के अहम में प्रायः प्राणी ईश्वर को भूल जाता कर्म दुष्कर्म की क्या परिभाषा प्रेम तो मूक स्मरण ही होता अध्यात्म ही जीवन मूल आधार ईश प्राप्ति उद्देश्य है इक रहता सोचे तौले समझ फिर बोले सदव्यवहार तब ही कर पाता एक नूर से सब जग उपज्या समझ सभी से प्यार वो करता शक्ति के अस्तित्व को फिर जाने शिव साकार रहस्य भी पाता सम भाव होकर वो प्राणी ईश अनुभव कृपा को पाता विभिन्न रूपों की क्या पहेली एक ईश्वर समर्पित रहता धर्म राष्ट्र भूखण्ड कोई हो ईश्वर सर्वत्र एक ही है होता सुबह साँझ नित करे प्रार्थना नित्य सुधार स्वतः हो जाता आत्मबोध संग ग्लानि भाव से तप कर सोना कन्चन बन जाता तू पारस परमेश्वर ओ स्वामी धन्य जन्म फिर उसका हो जाता मेरी वन्दना हे स्वमी बीकरुणेश्वर शीश चरणों में झुका जाता सदवुद्धि सदमार्ग हम पाएं मात्र यही मेरा मन कहता दुर्गुण हर हमे सद्गुण देना क्षमा सदा मैं तुमसे हूँ चाहता 🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
- Get link
- X
- Other Apps
प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी जन्म जन्म की जिन्ह भक्ति ईश कृपा वरदान जो पाये वही महानात्मये जगत में ऋषि मुनि देवी देव कहाये सर्वोच्च शक्ति ही वरदाती जो सकल सृष्टि इच्छा से चलाए कर्मफल तो पाना है पड़ता क्या है जो इससे मुक्त कराए मानव तो गलतियां ही करता कई बार दुष्कर्म भी हो जाये नित्य प्रातः करो वन्दना मन से मन कर्म वचन नियंत्रण पाये इसी प्रकार शयन समय भी दिवस कर्म विश्लेषण चाहे ईर्ष्या द्वेष विकारों से ऊपर मनुष्य अपराध बोध को पाये कितना सद्व्यवहार किया है करे आंकलन प्रयाश्चित कर पाए मन में ग्लानि अनुभूति संग क्षमा भाव से शीश झुकाये करे प्रयास सदा वो स्वयं से नहीं भविष्य में गलती दोहराए अहसास जिसे जब हो जाता नित्य वो प्रार्थना करता ही जाये समझे एक ईश्वर के परम सत्य को ज्ञान से आत्म वोध को जगाये परम शक्ति नहीं कोई जीवन गाथा इनसे ऊपर ही ईश्वर को पाये कड़तव्यनिष्ठ हो कर्म करे वो हृदय में लौ ईश प्रेम को जगाये जीवन का उद्देश्य वो पाता मानव जीवन सफल हो जाये कोई नहीं फिर पराया लगता सब में ईश का अंश समाये मेरे ही जैसा संसार है ये सारा ईश प्रेम ही इसको सजाये करूँ नमन मैं श्री चरणों में सदा सदा तुम्हारी शरण को पाएं 🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
- Get link
- X
- Other Apps
हमारा शुभ साल 22 अक्टूबर से शुरू होता है । आगे प्रदर्शन के बाद संसार भर में 22 अक्टूबर से ही साल शुरू होगा ।। जय श्री मदन ।🌹🌹🍁🔥💫💫⚡🌙⭐⭐💦🌟🌟💥🌹🔥🔥💫⚡🌙🌙
- Get link
- X
- Other Apps
सुख" तू कहाँ मिलता है ================= ❗ ऐ "सुख" तू कहाँ मिलता है क्या. तेरा कोई. स्थायी. पता. है ❗ क्यों बन बैठा है. अन्जाना आखिर. क्या है तेरा ठिकाना। ❗ कहाँ कहाँ. ढूंढा. तुझको पर. तू न. कहीं मिला मुझको ❗ ढूंढा. ऊँचे मकानों. में बड़ी बड़ी दुकानों. में स्वादिस्ट पकवानों. में चोटी. के. धनवानों. में ❗ वो भी तुझको. ढूंढ. रहे थे बल्कि मुझको. ही पूछ. रहे. थे ❗ क्या आपको कुछ पता है ये सुख आखिर कहाँ रहता है? ❗ मेरे. पास. तो. "दुःख" का पता था जो सुबह शाम. अक्सर. मिलता था ❗ परेशान होके रपट लिखवाई पर ये कोशिश भी काम न आई ❗ उम्र अब ढलान. पे. है हौसले थकान. पे. है ❗ हाँ उसकी. तस्वीर है मेरे. पास अब. भी. बची हुई. है आस ❗ मैं. भी. हार नही मानूंगा सुख. के. रहस्य को. जानूंगा ❗ बचपन. में मिला करता था मेरे साथ रहा करता. था ❗ पर. जबसे. मैं बड़ा हो. गया मेरा. सुख मुझसे जुदा. हो गया। ❗ मैं फिर भी. नही हुआ हताश जारी रखी उसकी तलाश ❗ एक. दिन. जब आवाज. ये आई क्या. मुझको. ढूंढ. रहा है भाई ✅ मैं. तेरे. अन्दर छुपा. हुआ. हूँ तेरे. ही. घर. में. बसा. हुआ. हूँ ❗ मेरा. नही. है कुछ. भी "मोल" सिक्कों. में. मुझको. न. तोल ❗ मैं. बच्चों. की. मुस्कानों. में हूँ हारमोनियम की. तानों में. हूँ ❗ पत्नी. के. साथ चाय. पीने. में "परिवार" के. संग. जीने. में ❗ माँ. बाप के. आशीर्वाद में रसोई घर के पकवानों में ❗ बच्चों की सफलता में हूँ माँ की निश्छल ममता में हूँ ❗ हर पल तेरे संग रहता हूँ और अक्सर तुझसे कहता हूँ ❗ मैं तो हूँ बस एक "अहसास" बंद कर दे तु मेरी तलाश ❗ जो मिला उसी में कर "संतोष" आज को जी ले कल की न सोच ❗ कल के लिए आज को न खोना मेरे लिए कभी दुखी न होना ।
- Get link
- X
- Other Apps
जय श्री मदन जी प्रतः वन्दन परम् शक्ति अनादि अनन्त है निरंकार जिसको कहते है वो साकार भी होती आई ये भक्ति की पराकाष्ठा पर है नहीं सिमित हम कर सकते ये तो उसकी सपनी इच्छा है जिसने सारी सृष्टि बना दी कुछ भी हो उसके निर्णय पर है दिए प्रमाण सदृश्य रूप में रहती अदृश्य प्रायः मगर है जड़ नहीं वो शक्ति चेतन है हो जाये जिसको भान अगर है प्रथम स्थान जीवन वो देता न कोई शिकायत करता फिर है रजा में उसको रहना आ जाता हो जाता प्यार न कोई फ़िक्र है प्यार करे सदा औरों से वो फिर मन में खोने का रहता डर है व्यवहार औरों से सदा वही करता औरों से स्वयं को चाहे खुद है प्रातः नित्य वो करे वन्दना आंकलन करता रात्रि पहर है यदि ईश्वर से कुछ पाना चाहते स्वीकृति अस्तित्व यही डगर है खोजे उसको प्यार करे वो रहे सदा हम उसके आभारी जो भी जीवन मूल तत्व है की प्रभु ने वो रचना सारी करें प्यार और खुश्बू फैलाये नित चरणों में शीश झुकायें नेककर्म सदव्यवहार करें हम सत्य ज्ञान प्रकाश फैलाएं करें व्यवहार वही औरों से जैसा औरों से स्वयं को चाहे हे सत्य सनातन सृष्टि के स्वामी श्री चरणों में वन्दना हम गाएँ प्रातः काल का प्रथम स्मरण तुम् तत्पश्चात दिन आरम्भ हो चाहे मन वुद्धि पर नियंत्रण रखना जो तुम् चाहो वो ही कर पाएं कोटि नमन पुनः चरणों में कृपा दृष्टि आपकी हम चाहें 👏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
- Get link
- X
- Other Apps
किसी मज़ार पर एक फकीर रहते थे। सैकड़ों भक्त उस मज़ार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे। उन भक्तों में एक बंजारा भी था। वह बहुत गरीब था, फिर भी, नियमानुसार आकर माथा टेकता, फकीर की सेवा करता, और फिर अपने काम पर जाता, उसका कपड़े का व्यवसाय था, कपड़ों की भारी पोटली कंधों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता, कपड़े बेचता। एक दिन उस फकीर को उस पर दया आ गई, उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया। अब तो बंजारे की आधी समस्याएं हल हो गईं। वह सारे कपड़े गधे पर लादता और जब थक जाता तो खुद भी गधे पर बैठ जाता। यूं ही कुछ महीने बीत गए,, एक दिन गधे की मृत्यु हो गई। बंजारा बहुत दुखी हुआ, उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया, उसकी कब्र बनाई और फूट-फूट कर रोने लगा। समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने जब यह दृश्य देखा, तो सोचा जरूर किसी संत की मज़ार होगी। तभी यह बंजारा यहां बैठकर अपना दुख रो रहा है। यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया। कुछ दिनों के उपरांत ही उस व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गई। उसने खुशी के मारे सारे गांव में डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक पूर्ण फकीर की मज़ार है। वहां जाकर जो अरदास करो वह पूर्ण होती है। मनचाही मुरादे बख्शी जाती हैं वहां। उस दिन से उस कब्र पर भक्तों का तांता लगना शुरू हो गया। दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादे बख्शाने वहां आने लगे। बंजारे की तो चांदी हो गई, बैठे-बैठे उसे कमाई का साधन मिल गया था। एक दिन वही फकीर जिन्होंने बंजारे को अपना गधा भेंट स्वरूप दिया था वहां से गुजर रहे थे। उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए और बोला- "आपके गधे ने तो मेरी जिंदगी बना दी। जब तक जीवित था तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था और मरने के बाद मेरी जीविका का साधन बन गया है।" फकीर हंसते हुए बोले, "बच्चा! जिस मज़ार पर तू नित्य माथा टेकने आता था, वह मज़ार इस गधे की मां की थी।" बस यूही चल रहा है मेरा भारत महान ।
- Get link
- X
- Other Apps
दिया सम्बोधन उत्तराधिकारी ने कल का सुखद अनुभव है दिया गृह प्रवेश के शुभ अवसर पर आशीष अपना प्रदान किया धन्य हुए है ये सज्जन जन घर को पवित्र पुनीत किया अमृत वाणी जिसने जितना किया है जप तप उनका उतना नाम किया भक्ति अमर करने की खातिर उनके रूपों में कार्य किया पूर्ण परमेश्वर लगा सम्मुख क्यों आधार घोषणा स्पष्ट किया सर्वोच्च शक्ति की आई है भू पर क्रियात्मक रूप में सिद्ध किया नियम गुण और अपनी शक्तियां दे प्रमाण अनुभूत किया श्री मदन धाम है प्रशिक्षण केंद्र आध्यात्मवाद एक गहरा सागर अध्यात्म -भौतिक इक जोड़ा है अध्यात्म की जरूरत ईश प्रेम है आत्मा की खुराक कहलाती ठीक उसी प्रकार कि कैसे भौतिक तन की जरूरत होती कुल देवता से भगवानों तक अध्यात्म में निश्चित पड़ाव दिए परम् शक्ति की शरण वो पाये जिसको उसने कुछ वचन दिए है आवश्यक समझना उसको जानो मानो पहचान करो सत्य ज्ञान को अमल में लाकर साकार रूप से प्यार करो सकल सृष्टि को रचने वाला कर्ता धर्ता वही है धर्ता आज वही इंसान बना है एलान उसी ईश्वर का मदन नाम उसने है रखा लगे भले साधारण इंसान पर पहचान स्वयं ही बताई है सर्वगुणों का करें प्रदर्शन पूज्य सभी का सकल सृष्टि में कोई नहीं है इष्ट मदन जी का न् ही गुरु या आराध्य है कोई नहीं हो सका प्रतीकों का स्थापन सात रंग का ध्वज भी दिया ज्ञान दिया है मद का ही ग्रन्थों आदि न् ज़िक्र किया पूर्ण ज्ञान और गहन भेद जो प्रशिक्षण केंद्र द्वारा स्पष्ट किया सर्वोच्च पूर्ण जो है सृष्टि में वही ये सब कर् सकता द्वान्दो का किया निवारण असम्भव जिसको कह दिया गया कौन है करता प्रत्येक रूप में एक ईश्वर कैसे होता है रचना और रचयिता का रिश्ता कर्मफल क्या आधार है क्या क्या यूँ रहती है परम् शक्ति अदृश्य ही युगों बाद पर धरती पर आती जड़ नहीं वो चेतन है वि इंसा से कुछ चाहे इसीलिये समय समय पर महात्माओं द्वारा नाम प्रतीक दिये भटक गया स्वार्थ में मानव उनको जी करता मान लिया करो दूसरों से चाहो जो स्वयं को ये पाप पुण्य की है परिभाषा यही आधार है परमशक्ति यदि कोई चल पाता है मुक्ति मोक्ष को वो पाकर स्वयं अलौकिक हो जाता है गुणगान है हिस्सा कार्यप्रणाली का जिसमे आप सम्मलित हुए हैं शुभाशीर्वाद
- Get link
- X
- Other Apps
🌻कायस्थ पुराण🌻 👉सरल हिन्दी भाषा में👈 कायस्थ भारत में रहने वाले सवर्ण हिन्दू समुदाय की एक जाति है। गुप्तकाल के दौरान कायस्थ नाम की एक उपजाति का उद्भव हुआ। पुराणों के अनुसार कायस्थ प्रशासनिक कार्यों का निर्वहन करते हैं। हिंदू धर्म की मान्यता है कि कायस्थ धर्मराज श्री चित्रगुप्त जी की संतान हैं तथा देवता कुल में जन्म लेने के कारण इन्हें ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों धर्मों को धारण करने का अधिकार प्राप्त है। परन्तू सूर्यदेव एवं नागदेव से सम्बन्ध होनें के कारण यह विशुद्ध छत्रिय है क्योंकी दोनों ही छत्रिय है एवं स्वयं चित्रगुप्त जी सम्पूर्ण काया के सांथ प्रगट हुये सो शुद्ध छत्रिय कहलाये| यदि ब्रहम्मा से उपजित मनुष्य जाति के आधार पर देखें तो यह पांचवा परन्तू पहला ऐसा वर्ग है जिसमें वह चारों गुंड भी विध्यमान हैं जो ब्रहम्मा जी नें अपनें अंगों से वर्गाक्रत किये| 👉वर्तमान में कायस्थ मुख्य रूप से बिसारिया , श्रीवास्तव, सक्सेना,निगम, माथुर, भटनागर, लाभ, लाल, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, कर्ण, वर्मा, खरे, राय, सुरजध्वज, विश्वास, सरकार, बोस, दत्त, चक्रवर्ती, श्रेष्ठ, प्रभु, ठाकरे, आडवाणी, नाग, गुप्त, रक्षित, बक्शी, मुंशी, दत्ता, देशमुख, पटनायक, नायडू, सोम, पाल, राव, रेड्डी, मेहता आदि उपनामों से जाने जाते हैं। वर्तमान में कायस्थों ने राजनीति और कला के साथ विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक विद्यमान हैं। 👉 वेदों के अनुसार कायस्थ का उद्गम ब्रह्मा ही हैं। कलिकाल में जब मनुष्य वेदों को अपनी इच्छानुसार उपयोग करनें लगा तब चारों वेद रूष्ठ हो समुद्र तल में जा बैठे और ब्रहम्मा का ध्यान करनें लगै जब ब्रहम्मा जी नें इसका कारण पूछा तो उन्होनें ब्रह्मा जी को बताया की शास्त्रों का दुरूपयोग होनें लगा है सभी मनुष्य हमारे नाम का हमारे ज्ञान का दुरूपयोग करनें लगे है झूठ फरेब इतना बड़ गया की हमें स्वयं उन्हें छोडकर समुद्र तल में छुपना पडा तभी यमराज भी आ पहुचे और उन्होंनें ब्रहम्मा जी से धर्मपरायण- सत्यवादी- ज्ञानी पुरूष जो यमपुरी में रहकर उनका सहयोग कर सके की याचना की| यह सुन ब्रहम्मा जी ने अपनें ईश्ट प्रभू जो संसार के देवों के भी उत्पत्ती के कारक हैं का ध्यान किया| ब्रहम्मा जी ध्यान में इतना खो गये की उन्हें ध्यानमग्न हुये ११००० वर्ष हो गये- तभी ब्रहम्मा जी के कानों में औम का स्वर गूंजा और उन्होनें देखा सामनें एक दिव्य पुरूष खडे थे| ब्रहम्मा जी नें पूछा आप कौन हैं उस दिव्य पुरूष नें कहा- आप जानें तब ब्रहम्मा जी समझ गये की वह जिनका ध्यान कर रहे थे वह वही हैं| तब ब्रहम्मा जी नें कहा आप संसार में शसरीर उत्पन्न हुये हैं सम्पूर्ण काया में हैं इसलिये आप कायस्थ हैं| इसपर उस दिव्य पुरूष नें ब्रहम्मा जी से कहा की आप मेरे प्रगट होनें का कारण है सो मेरा नामकरण करें- तब ब्रहम्मा जी नें कहा चूंकी आप मेरे चित्त में गुप्त रूप से विध्यमान रहे इसलिये आपको आज से चित्रगुप्त पुकारा जायगा| तब प्रभू नें एक और प्रश्न किया- मेरा कर्म क्या होगा? तब ब्रहम्मा जी नें कहा आपकी उत्पत्ती का कारण धर्म अधर्म है सो आप प्रत्येक जीव में शूछ्म रूप में विध्यमान होंगे और प्रत्येक देवी देवता,यक्ष,दानव,जीव,जन्तू के कर्मों का लेखा जोखा रखेंगें और यमराज के सांथ यमपुरी में वास करेंगें| ऐसा सुन यमराज नें सर्वप्रथम चित्रगुप्त जी को कहा आयें चलें मित्र धर्मराज| तभी से सभी देवी देवता श्री प्रभू चित्रगुप्त जी को धर्मराज कहकर सम्बोधित करते है| 🌷शुद्ध एवं सिद्ध मंत्र🌷 ||औम यमाय धर्मराज श्री चित्रगुप्त वै नम:|| 🌷परिवार एवं परिचय🌷 पद्म पुराण के अनुसार कायस्थ कुल के ईष्ट देव श्री चित्रगुप्त जी के दो सेवक हैं जिन्हें स्वयं माँ सरस्वति ने धर्म की पूर्णता हेतू वरदान स्वरूप दिये जिनका नाम -१-शुकर्मा एवं २-कुकर्मा है जो प्रत्येक जीव के जन्म से मरण तक के कर्मों का व्योरा रखते हैं एवं म्रत्यू उपरांत वह ब्योरा प्रभू श्री चित्रगुप्त के समक्ष पेश किया जाता है जिससे अगले जन्म की काया तै होती होती है| प्रभू श्री चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुए। इनकी प्रथम पत्नी सूर्यदक्षिणा (जिन्हें नंदिनी भी कहते हैं) सूर्य-पुत्र श्राद्धदेव की कन्या थी, इनसे ४ पुत्र हुए-भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू । इनकी द्वितीय पत्नी ऐरावती (जिसे शोभावती भी कहते हैं) धर्मशर्मा नामक एक नागवन्शी क्षत्रिय की कन्या थी, इनसे ८ पुत्र हुए चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र एवं अतिन्द्रिय कहलाए। इसका उल्लेख अहिल्या, कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों में भी किया गया है। चित्रगुप्त जी के बारह पुत्रों का विवाह नागराज वासुकी की बारह कन्याओं से सम्पन्न हुआ।इसी कारण कायस्थों की ननिहाल नागवंश मानी जाती है और नागपंचमी के दिन नाग पूजा की जाती है। नंदिनी के चार पुत्र काश्मीर के निकटवर्ती क्षेत्रों में जाकर बस गये तथा ऐरावती के आठ पुत्रों ने गौड़ देश के आसपास (वर्तमान बिहार, उड़ीसा, तथा बंगाल) में जा कर निवास किया। वर्तमान बंगाल उस काल में गौड़ देश कहलाता था| इन बारह पुत्रों के वंश के अनुसार कायस्थ कुल में १२ शाखाएं हैं जो - श्रीवास्तव, सूर्यध्वज, वाल्मीक, अष्ठाना, माथुर, गौड़, भटनागर, सक्सेना, अम्बष्ठ, निगम, कर्ण, कुलश्रेष्ठ नामों से चलती हैं। 🌷कामधेनु, धर्मशास्त्र एवं पुराणों के अनुसार इन बारह पुत्रों का विवरण इस प्रकार से है: 🌷नंदिनी-पुत्र🌷 🌷भानु👉 प्रथम पुत्र भानु कहलाये जिनका राशि नाम धर्मध्वज था| चित्रगुप्त जी ने श्रीभानु को श्रीवास (श्रीनगर) और कान्धार क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था| उनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री पद्मिनी से हुआ था एवं देवदत्त और घनश्याम नामक दो पुत्रों हुए। देवदत्त को कश्मीर एवं घनश्याम को सिन्धु नदी के तट का राज्य मिला। श्रीवास्तव २ वर्गों में विभाजित हैं - खर एवं दूसर। इनके वंशज आगे चलकर कुछ विभागों में विभाजित हुए जिन्हें अल कहा जाता है। श्रीवास्तवों की अल इस प्रकार हैं - वर्मा, सिन्हा, अघोरी, पडे, पांडिया,रायजादा, कानूनगो, जगधारी, प्रधान, बोहर, रजा सुरजपुरा,तनद्वा, वैद्य, बरवारिया, चौधरी, रजा संडीला, देवगन, इत्यादि। 🌷विभानु 👉 द्वितीय पुत्र विभानु हुए जिनका राशि नाम श्यामसुंदर था। इनका विवाह मालती से हुआ। चित्रगुप्त जी ने विभानु को काश्मीर के उत्तर क्षेत्रों में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इन्होंने अपने नाना सूर्यदेव के नाम से अपने वंशजों के लिये सूर्यदेव का चिन्ह अपनी पताका पर लगाने का अधिकार एवं सूर्यध्वज नाम दिया। अंततः वह मगध में आकर बसे। 🌷विश्वभानू 👉 तृतीय पुत्र विश्वभानु हुए जिनका राशि नाम दीनदयाल था और ये देवी शाकम्भरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने उनको चित्रकूट और नर्मदा के समीप वाल्मीकि क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनका विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ एवं इनका विवाह नागकन्या देवी बिम्ववती से हुआ एवं इन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा भाग नर्मदा नदी के तट पर तपस्या करते हुए बिताया जहां तपस्या करते हुए उनका पूर्ण शरीर वाल्मीकि नामक लता से ढंक गया था, अतः इनके वंशज वाल्मीकि नाम से जाने गए और वल्लभपंथी बने। इनके पुत्र श्री चंद्रकांत गुजरात जाकर बसे तथा अन्य पुत्र अपने परिवारों के साथ उत्तर भारत में गंगा और हिमालय के समीप प्रवासित हुए। वर्तमान में इनके वंशज गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं , उनको "वल्लभी कायस्थ" भी कहा जाता है। 🌷वीर्यभानू👉 चौथे पुत्र वीर्यभानु का राशि नाम माधवराव था और इनका विवाह देवी सिंघध्वनि से हुआ था। ये देवी शाकम्भरी की पूजा किया करते थे। चित्रगुप्त जी ने वीर्यभानु को आदिस्थान (आधिस्थान या आधिष्ठान) क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। इनके वंशजों ने आधिष्ठान नाम से अष्ठाना नाम लिया एवं रामनगर (वाराणसी) के महाराज ने उन्हें अपने आठ रत्नों में स्थान दिया। वर्तमान में अष्ठाना उत्तर प्रदेश के कई जिले और बिहार के सारन, सिवान , चंपारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी,दरभंगा और भागलपुर क्षेत्रों में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भी उनकी संख्या है। ये ५ अल में विभाजित हैं | 🌷ऐरावती-पुत्र संपादित करें🌷 🌷चारु 👉 ऐरावती के प्रथम पुत्र का नाम चारु था एवं ये गुरु मथुरे के शिष्य थे तथा इनका राशि नाम धुरंधर था। इनका विवाह नागपुत्री पंकजाक्षी से हुआ एवं ये दुर्गा के भक्त थे। चित्रगुप्त जी ने चारू को मथुरा क्षेत्र में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था अतः इनके वंशज माथुर नाम से जाने गये। तत्कालीन मथुरा राक्षसों के अधीन था और वे वेदों को नहीं मानते थे। चारु ने उनको हराकर मथुरा में राज्य स्थापित किया। तत्पश्चात् इन्होंने आर्यावर्त के अन्य भागों में भी अपने राज्य का विस्तार किया। माथुरों ने मथुरा पर राज्य करने वाले सूर्यवंशी राजाओं जैसे इक्ष्वाकु, रघु, दशरथ और राम के दरबार में भी कई महत्त्वपूर्ण पद ग्रहण किये। वर्तमान माथुर ३ वर्गों में विभाजित हैं -देहलवी,खचौली एवं गुजरात के कच्छी एवं इनकी ८४ अल हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कटारिया, सहरिया, ककरानिया, दवारिया,दिल्वारिया, तावाकले, राजौरिया, नाग, गलगोटिया, सर्वारिया,रानोरिया इत्यादि। एक मान्यता अनुसार माथुरों ने पांड्या राज्य की स्थापना की जो की वर्तमान में मदुरै, त्रिनिवेल्ली जैसे क्षेत्रों में फैला था। माथुरों के दूत रोम के ऑगस्टस कैसर के दरबार में भी गए थे। 🌷सुचारु👉 द्वितीय पुत्र सुचारु गुरु वशिष्ठ के शिष्य थे और उनका राशि नाम धर्मदत्त था। ये देवी शाकम्बरी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने सुचारू को गौड़ देश में राज्य स्थापित करने भेजा था एवं इनका विवाह नागराज वासुकी की पुत्री देवी मंधिया से हुआ। इनके वंशज गौड़ कहलाये एवं ये ५ वर्गों में विभाजित हैं: - खरे, दुसरे, बंगाली, देहलवी, वदनयुनि। गौड़ कायस्थों को ३२ अल में बांटा गया है। गौड़ कायस्थों में महाभारत के भगदत्त और कलिंग के रुद्रदत्त राजा हुए थे। 🌷 चित्र👉 तृतीय पुत्र चित्र हुए जिन्हें चित्राख्य भी कहा जाता है, गुरू भट के शिष्य थे, अतः भटनागर कहलाये। इनका विवाह देवी भद्रकालिनी से हुआ था तथा ये देवी जयंती की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्राक्ष को भट देश और मालवा में भट नदी के तट पर राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इन क्ष्त्रों के नाम भी इन्हिं के नाम पर पड़े हैं। इन्होंने चित्तौड़ एवं चित्रकूट की स्थापना की और वहीं बस गए। इनके वंशज भटनागर के नाम से जाने गए एवं ८४ अल में विभाजित हैं, इनकी कुछ अल इस प्रकार हैं- डसानिया, टकसालिया, भतनिया, कुचानिया, गुजरिया,बहलिवाल, महिवाल, सम्भाल्वेद, बरसानिया, कन्मौजिया इत्यादि| भटनागर उत्तर भारत में कायस्थों के बीच एक आम उपनाम है। 🌷 मतिमान👉 चतुर्थ पुत्र मतिमान हुए जिन्हें हस्तीवर्ण भी कहा जाता है। इनका विवाह देवी कोकलेश में हुआ एवं ये देवी शाकम्भरी की पूजा करते थे। चित्रगुप्त जी ने मतिमान को शक् इलाके में राज्य स्थापित करने भेजा। उनके पुत्र महान योद्धा थे और थुद्ध की अनेकानेक कलाऔं के निर्माता भी इनकी व्यूह रचना का कोई तोड नहीं था | उन्होंने आधुनिक काल के कान्धार और यूरेशिया भूखंडों पर अपना राज्य स्थापित किया। ये शक् थे और शक् साम्राज्य से थे तथा उनकी मित्रता सेन साम्राज्य से थी, तो उनके वंशज शकसेन या सक्सेना कहलाये। आधुनिक इरान का एक भाग उनके राज्य का हिस्सा था। वर्तमान में ये कन्नौज, पीलीभीत, बदायूं, फर्रुखाबाद, इटाह,इटावा, मैनपुरी, और अलीगढ में पाए जाते हैं| सक्सेना लोग खरे और दूसर में विभाजित हैं और इस समुदाय में १०६ अल हैं, जिनमें से कुछ अल इस प्रकार हैं- जोहरी, हजेला, अधोलिया, रायजादा, कोदेसिया, कानूनगो, बरतरिया, बिसारिया, प्रधान, कम्थानिया, दरबारी, रावत, सहरिया,दलेला, सोंरेक्षा, कमोजिया, अगोचिया, सिन्हा, मोरिया, इत्यादि| 🌷हिमवान👉 पांचवें पुत्र हिमवान हुए जिनका राशि नाम सरंधर था उनका विवाह भुजंगाक्षी से हुआ। ये अम्बा माता की अराधना करते थे तभी चित्रगुप्त जी के अनुसार गिरनार और काठियवार के अम्बा-स्थान नामक क्षेत्र में बसने के कारण उनका नाम अम्बष्ट पड़ा। हिमवान के पांच पुत्र हुए: नागसेन, गयासेन, गयादत्त, रतनमूल और देवधर। ये पाँचों पुत्र विभिन्न स्थानों में जाकर बसे और इन स्थानों पर अपने वंश को आगे बढ़ाया। इनमें नागसेन के २४ अल, गयासेन के ३५ अल, गयादत्त के ८५ अल, रतनमूल के २५ अल तथा देवधर के २१ अल हैं। कालाम्तर में ये पंजाब में जाकर बसे जहाँ उनकी पराजय सिकंदर के सेनापति और उसके बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के हाथों हुई। मान्यता अनुसार अम्बष्ट कायस्थ बिजातीय विवाह की परंपरा का पालन करते हैं और इसके लिए "खास घर" प्रणाली का उपयोग करते हैं। इन घरों के नाम उपनाम के रूप में भी प्रयोग किये जाते हैं। ये "खास घर" वे हैं जिनसे मगध राज्य के उन गाँवों का नाम पता चलता है जहाँ मौर्यकाल में तक्षशिला से विस्थापित होने के उपरान्त अम्बष्ट आकर बसे थे। इनमें से कुछ घरों के नाम हैं- भीलवार, दुमरवे, बधियार, भरथुआर, निमइयार, जमुआर,कतरयार पर्वतियार, मंदिलवार, मैजोरवार, रुखइयार, मलदहियार,नंदकुलियार, गहिलवार, गयावार, बरियार, बरतियार, राजगृहार,देढ़गवे, कोचगवे, चारगवे, विरनवे, संदवार, पंचबरे, सकलदिहार,करपट्ने, पनपट्ने, हरघवे, महथा, जयपुरियार, आदि| 🌷विश्वभानू👉 छठवें पुत्र का नाम विश्वभानू था जिनका राशि नाम सुमंत था और उनका विवाह अशगंधमति से हुआ। ये देवी दुर्गा की अराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचारू को महाकोशल और निगम क्षेत्र (सरयू नदी के तट पर) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा। उनके वंशज वेदों और शास्त्रों की विधियों में पारंगत थे जिससे उनका नाम निगम पड़ा। वर्तमान में ये कानपुर, फतेहपुर, हमीरपुर, बंदा, जलाओं,महोबा में रहते हैं एवं ४३ अल में विभाजित हैं। कुछ अल इस प्रकार हैं- कानूनगो, अकबरपुर, अकबराबादी, घताम्पुरी,चौधरी, कानूनगो बाधा, कानूनगो जयपुर, मुंशी इत्यादि। 🌷 चित्रचारू👉 सातवें पुत्र चित्रचरण थे जिनका राशि नाम दामोदर था एवं उनका विवाह देवी कोकलसुता से हुआ। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे और वैष्णव थे। चित्रगुप्त जी ने चित्रचरण को कर्ण क्षेत्र (वर्तमाआन कर्नाटक) में राज्य स्थापित करने के लिए भेजा था। इनके वंशज कालांतर में उत्तरी राज्यों में प्रवासित हुए और वर्तमान में नेपाल, उड़ीसा एवं बिहार में पाए जाते हैं। ये बिहार में दो भागों में विभाजित है: गयावाल कर्ण – गया में बसे एवं मैथिल कर्ण जो मिथिला में जाकर बसे। इनमें दास, दत्त, देव, कण्ठ, निधि,मल्लिक, लाभ, चौधरी, रंग आदि पदवी प्रचलित हैं। मैथिल कर्ण कायस्थों की एक विशेषता उनकी पंजी पद्धति है, जो वंशावली अंकन की एक प्रणाली है। कर्ण ३६० अल में विभाजित हैं। इस विशाल संख्या का कारण वह कर्ण परिवार हैं जिन्होंने कई चरणों में दक्षिण भारत से उत्तर की ओर प्रवास किया। यह ध्यानयोग्य है कि इस समुदाय का महाभारत के कर्ण से कोई सम्बन्ध नहीं है। 🌷चारुण👉 अंतिम या आठवें पुत्र चारुण थे जो अतिन्द्रिय भी कहलाते थे। इनका राशि नाम सदानंद है और उन्होंने देवी मंजुभाषिणी से विवाह किया। ये देवी लक्ष्मी की आराधना करते थे। चित्रगुप्त जी ने अतिन्द्रिय को कन्नौज क्षेत्र में राज्य स्थापित करने भेजा था। अतियेंद्रिय चित्रगुप्त जी की बारह संतानों में से सर्वाधिक धर्मनिष्ठ और सन्यासी प्रवृत्ति वाले थे। इन्हें 'धर्मात्मा' और 'पंडित' नाम से भी जाना गया और स्वभाव से धुनी थे। इनके वंशज कुलश्रेष्ठ नाम से जाने गए तथा आधुनिक काल में ये मथुरा, आगरा, फर्रूखाबाद, एटा, इटावा और मैनपुरी में पाए जाते हैं | कुछ कुलश्रेष्ठ जो की माता नंदिनी के वंश से हैं, नंदीगांव - बंगाल में पाए जाते हैं | 💐ध्यान योग्य कायस्थ जानकारी - बच्चों को अवश्य बतायें
- Get link
- X
- Other Apps
प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी सर्वोच्च एक वही शिव कहलाये शाश्वत शक्ति का जो वोध कराए नहीं कोई वो वाघम्बरधारी वो ही ब्रह्म अल्लाह कहलाये एक ओंकार ॐ वाहेगुरु सब पूर्ण परमेश्वर के नाम कहाये शक्ति एक जो अनादि अनन्त अगम्य अगोचर ही जानी जाये कहते जिसको अजोनि अजन्मा नहीं पूर्ण सत्य कभी भेद बताये जिसको जैसा अनुभव दे दीन्हा प्राणी उसे ही सत्य मान जाये पूर्ण ज्ञान का रहा आभाव जिस कारण मतान्तर आये नहीं कभी शक्ति ने कहा किसी को वो जन्म लेकर् भू पर नहीं आये समय वातावरण के अनुसार परम् शक्ति ने अनुभव करवाये चाहे मनुष्य से मात्र इतना ही जाने माने पहचान कराए अंश है जिसका प्राणी का जीवन उसी की इच्छा श्वांसे चलवाये एक सत्य प्रकाश सब जाने एक नूर से ही जो प्रेम फैलाये कर्तव्य मनुष्य का उस शक्ति प्रति नतमस्तक हो आभार जताये सर्वश्रेष्ठ कृति जो सकल सृष्टि में वही मात्र मानव कहलाये मानवोत्त्पत्ति से पूर्व ही उसने मानवोपयोगी संसाधन बनाये हरी भरी ये बसुन्धरा जल वायु नील गगन में सुमन खिलाये फिर क्यों मानव तू है भूला जो तेरा भी अस्तित्व कहलाये प्रातः वन्दन दिवस आरम्भ है कर्म सुमङ्गल तब ही कर पाए साँझ वन्दना क्षमा याचना है जो आंकलन खुद का करवाये करे कर्म व्यवहार सबसे जो खुद को भी उनसे जो हम छाए मीठी वाणी हो कर्म समर्पित निज स्वार्थ से ऊपर उठ पाएं क्यों आया है तू इस जग में मुक्ति इच्छाओं को जीत हम पाये सतत नमन करें श्री चरणों में सदवुद्धि सदमार्ग सदा पाये 🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
- Get link
- X
- Other Apps
1:- जीवन में वो ही व्यक्ति असफल होते है, जो सोचते है पर करते नहीं । 2 :- भगवान के भरोसे मत बैठिये क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठा हो… 3 :- सफलता का आधार है सकारात्मक सोच और निरंतर प्रयास !!! 4 :- अतीत के ग़ुलाम नहीं बल्कि भविष्य के निर्माता बनो… 5 :- मेहनत इतनी खामोशी से करो की सफलता शोर मचा दे… 6 :- कामयाब होने के लिए अकेले ही आगे बढ़ना पड़ता है, लोग तो पीछे तब आते है जब हम कामयाब होने लगते है. 7 :- छोड़ दो किस्मत की लकीरों पे यकीन करना, जब लोग बदल सकते हैं तो किस्मत क्या चीज़ है… 8 :- यदि हार की कोई संभावना ना हो तो जीत का कोई अर्थ नहीं है… 9 :- समस्या का नहीं समाधान का हिस्सा बने… 10 :- जिनको सपने देखना अच्छा लगता है उन्हें रात छोटी लगती है और जिनको सपने पूरा करना अच्छा लगता है उनको दिन छोटा लगता है… 11 :- आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते पर आप अपनी आदतें बदल सकते है और निशचित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देगी ! 12 :- एक सपने के टूटकर चकनाचूर हो जानें के बाद दूसरा सपना देखने के हौसले को ज़िंदगी कहते है !!! 13 :- वो सपने सच नहीं होते जो सोते वक्त देखें जाते है, सपने वो सच होते है जिनके लिए आप सोना छोड़ देते है… 14 :- सफलता का चिराग परिश्रम से जलता है !!! 15 :- जिनके इरादे बुलंद हो वो सड़कों की नहीं आसमानो की बातें करते है… 16 :- सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं… 17 :- मैं तुरंत नहीं लेकिन निश्चित रूप से जीतूंगा… 18 :- सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगें लोग… 19 :- आशावादी हर आपत्तियों में भी अवसर देखता है और निराशावादी बहाने !!! 20 :- आप में शुरू करने की हिम्मत है तो, आप में सफल होने के लिए भी हिम्मत है… 21 :- सच्चाई वो दिया है जिसे अगर पहाड़ की चोटी पर भी रख दो तो बेशक रोशनी कम करे पर दिखाई बहुत दूर से भी देता है. 22 :- संघर्ष में आदमी अकेला होता है, सफलता में दुनिया उसके साथ होती है ! जिस जिस पर ये जग हँसा है उसी उसी ने इतिहास रचा है. 23 :- खोये हुये हम खुद है और ढूढ़ते ख़ुदा को है !!! 24 :- कामयाब लोग अपने फैसले से दुनिया बदल देते है और नाकामयाब लोग दुनिया के डर से अपने फैसले बदल लेते है… 25 :- भाग्य को और दूसरों को दोष क्यों देना जब सपने हमारे है तो कोशिशें भी हमारी होनी चाहियें !!! 26 :- यदि मनुष्य सीखना चाहे तो उसकी प्रत्येक भूल उसे कुछ न कुछ सिखा देती है !!! 27 :- झूठी शान के परिंदे ही ज्यादा फड़फड़ाते है तरक्की के बाज़ की उड़ान में कभी आवाज़ नहीं होती… 28 :- समस्या का सामना करें, भागे नहीं, तभी उसे सुलझा सकते हैं… 29 :- परिवर्तन से डरना और संघर्ष से कतराना मनुष्य की सबसे बड़ी कायरता है. 30 :- सुंदरता और सरलता की तलाश चाहे हम सारी दुनिया घूम के कर लें लेकिन अगर वो हमारे अंदर नहीं तो फिर सारी दुनिया में कहीं नहीं है. 31 :- ना किसी से ईर्ष्या ना किसी से कोई होड़, मेरी अपनी मंज़िलें मेरी अपनी दौड़… 32 :- ये सोच है हम इंसानों की कि एक अकेला क्या कर सकता है, पर देख ज़रा उस सूरज को वो अकेला ही तो चमकता है !!! 33 :- लगातार हो रही असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि कभी कभी गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल देती है… 34 :- जल्द मिलने वाली चीजें ज्यादा दिन तक नहीं चलती और जो चीजें ज्यादा दिन तक चलती है वो जल्दी नहीं मिलती है. 35 :- इंसान तब समझदार नहीं होता जब वो बड़ी बड़ी बातें करने लगे, बल्कि समझदार तब होता है जब वो छोटी छोटी बातें समझने लगे… 36 :- सेवा सभी की करना मगर आशा किसी से भी ना रखना क्योंकि सेवा का वास्तविक मूल्य नही दे सकते है, 37 :- मुश्किल वक्त का सबसे बड़ा सहारा है “उम्मीद” !! जो एक प्यारी सी मुस्कान दे कर कानों में धीरे से कहती है “सब अच्छा होगा” !! 38 :- दुनिया में कोई काम असंभव नहीं, बस हौसला और मेहनत की जरुरत है !!! 39 :- वक्त आपका है चाहे तो सोना बना लो और चाहे तो सोने में गुजार दो, दुनिया आपके उदाहरण से बदलेगी आपकी राय से नहीं… 40 :- बदलाव लाने के लिए स्वयं को बदले… 41 :- सफल व्यक्ति लोगों को सफल होते देखना चाहते है, जबकि असफल व्यक्ति लोगों को असफल होते देखना चाहते है… 42 :- घड़ी सुधारने वाले मिल जाते है लेकिन समय खुद सुधारना पड़ता है !!! 43 :- दुनिया में सब चीज मिल जाती है केवल अपनी ग़लती नहीं मिलती… 44 :- क्रोध और आंधी दोनों बराबर… शांत होने के बाद ही पता चलता है की कितना नुकसान हुवा… 45 :- चाँद पे निशान लगाओ, अगर आप चुके तो सितारों पे तो जररू लगेगा !!! 46 :- गरीबी और समृद्धि दोनों विचार का परिणाम है… 47 :- पसंदीदा कार्य हमेशा सफलता, शांति और आनंद ही देता है… 48 :- जब हौसला बना ही लिया ऊँची उड़ान का तो कद नापना बेकार है आसमान का… 49 :- अपनी कल्पना को जीवन का मार्गदर्शक बनाए अपने अतीत को नहीं… 50 :- समय न लागओ तय करने में आपको क्या करना है, वरना समय तय कर लेगा की आपका क्या करना है. 51 :- अगर तुम उस वक्त मुस्कुरा सकते हो जब तुम पूरी तरह टूट चुके हो तो यकीन कर लो कि दुनिया में तुम्हें कभी कोई तोड़ नहीं सकता !!! 52 :- कल्पना के बाद उस पर अमल ज़रुर करना चाहिए। सीढ़ियों को देखते रहना ही पर्याप्त नहीं है, उन पर चढ़ना भी ज़रुरी है। 53 :- हमें जीवन में भले ही हार का सामना करना पड़ जाये पर जीवन से कभी नहीं हारना चाहिए… 54 :- सीढ़ियां उन्हें मुबारक हो जिन्हें छत तक जाना है, मेरी मंज़िल तो आसमान है रास्ता मुझे खुद बनाना है !!! 55 :- हजारों मील के सफ़र की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है… 56 :- मनुष्य वही श्रेष्ठ माना जाएगा जो कठिनाई में अपनी राह निकालता है । 57 :- पुरुषार्थ से असंभव कार्य भी संभव हो जाता है… 58 :- प्रतिबद्ध मन को कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, पर अंत में उसे अपने परिश्रम का फल मिलेगा । 59 :- असंभव समझे जाने वाला कार्य संभव करके दिखाये, उसे ही प्रतिभा कहते हैं । 60 :- आने वाले कल को सुधारने के लिए बीते हुए कल से शिक्षा लीजिए… 61 :- जो हमेशा कहे मेरे पास समय नहीं है, असल में वह व्यस्त नहीं बल्कि अस्त-व्यस्त है । 62 :- कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने आती हैं… 63 :- क्रोध वह हवा है जो बुद्धि के दीप को बुझा देती है । 64 :- आपका भविष्य उससे बनता है जो आप आज करते हैं, उससे नहीं जो आप कल करेंगे… 65 :- बन सहारा बे सहारों के लिए बन किनारा बे किनारों के लिए, जो जिये अपने लिए तो क्या जिये जी सको तो जियो हजारों के लिए । 66 :- चाहे हजार बार नाकामयाबी हो, कड़ी मेहनत और सकारात्मक सोच के साथ लगे रहोगे तो अवश्य सफलता तुम्हारी है… 67 :- खुद की तरक्की में इतना समय लगा दो, कि किसी और की बुराई का वक्त ही ना मिले !!! 68 :- प्रगति बदलाव के बिना असंभव है, और जो अपनी सोच नहीं बदल सकते वो कुछ नहीं बदल सकते… 69 :- खुशी के लिए काम करोगे तो ख़ुशी नहीं मिलेगी, लेकिन खुश होकर काम करोगे, तो ख़ुशी और सफलता दोनों ही मिलेगी । 70 :- पराजय तब नहीं होती जब आप गिर जाते हैं, पराजय तब होती है जब आप उठने से इनकार कर देते हैं । 71 :- मन बुद्ध जैसा और दिल बच्चों जैसा होना चाहिए✍🏿 जय श्री मदन जी
- Get link
- X
- Other Apps