प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी न ही नर है न वो नारी है शक्ति तो मात्र शक्ति है किन्तु अपूर्ण बिन आकार बनता यही दरश आधार बिन दर्शन नहीं पूरी आस बिना मिलन अपूर्ण है प्यास तभी प्रतिक बने जगत में जो आधार हृदय अभिलाष मानव निज स्वार्थ के कारण उलझ चुका जकड़ मोहपाश जहाँ हो जाये मनोरथ पूरे मनुष्य वही सीमित हो जाता सत्य न जाने न खुद को पहचाने स्वार्थ पूर्ति में वो भटक जाता रंग रूप यश धन के अहम में प्रायः प्राणी ईश्वर को भूल जाता कर्म दुष्कर्म की क्या परिभाषा प्रेम तो मूक स्मरण ही होता अध्यात्म ही जीवन मूल आधार ईश प्राप्ति उद्देश्य है इक रहता सोचे तौले समझ फिर बोले सदव्यवहार तब ही कर पाता एक नूर से सब जग उपज्या समझ सभी से प्यार वो करता शक्ति के अस्तित्व को फिर जाने शिव साकार रहस्य भी पाता सम भाव होकर वो प्राणी ईश अनुभव कृपा को पाता विभिन्न रूपों की क्या पहेली एक ईश्वर समर्पित रहता धर्म राष्ट्र भूखण्ड कोई हो ईश्वर सर्वत्र एक ही है होता सुबह साँझ नित करे प्रार्थना नित्य सुधार स्वतः हो जाता आत्मबोध संग ग्लानि भाव से तप कर सोना कन्चन बन जाता तू पारस परमेश्वर ओ स्वामी धन्य जन्म फिर उसका हो जाता मेरी वन्दना हे स्वमी बीकरुणेश्वर शीश चरणों में झुका जाता सदवुद्धि सदमार्ग हम पाएं मात्र यही मेरा मन कहता दुर्गुण हर हमे सद्गुण देना क्षमा सदा मैं तुमसे हूँ चाहता 🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏

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