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Showing posts from July, 2017
🕸 *आंतरिक प्रकाश*🕸 *Inner Light*...... 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 ज्ञानी कहते हैं भीतर जाओ, वहां परम-प्रकाश है। तुम आंख बंद करते हो, वहां सिवाय अंधेरे के कुछ भी नहीं पाते। ये बुद्ध, ये महावीर, ये कृष्ण, ये क्राइस्ट या तो भ्रांति में पड़ गये, या धोखा दे रहे हैं लोगों को। कहते हैं, भीतर परम-प्रकाश है। और तुम तो जब भी आंख बंद करते हो, अंधेरा पाते हो। तुम्हें प्रकाश बाहर तो थोड़ा-बहुत दिखाई भी पड़ता है सूरज का, बिजली का। लेकिन भीतर न तो बिजली है न सूरज, वहां घना अंधकार है। यह अंधकार इसलिए नहीं है कि बुद्ध और महावीर झूठ बोल रहे हैं, या किसी को धोखा देना चाहते हैं। यह अंधकार इसलिए है कि ज्योति पर तुम्हारा ध्यान ही नहीं जाता। और भीतर का प्रकाश तो बड़ा धीमा है, मद्धिम है। उसकी कोई चोट नहीं है। वह बड़ा अहिंसात्मक है, उसमें कोई त्वरा नहीं है, आग नहीं है। वह ऐसा है जैसे सुबह सूरज नहीं ऊगता, रात जा चुकी होती है, तब ब्रह्म-मुहूर्त में जैसा प्रकाश होता है। इसलिए तो हिंदुओं ने ब्रह्ममुहूर्त को ध्यान का समय चुना है। क्योंकि उस प्रकाश से भीतर के प्रकाश से थोड़ा तालमेल है। सूरज ऊगा नहीं है; क्योंकि सूरज के ऊगते ही तप्त, त्वरा, तीव्रता पैदा हो जायेगी। सूरज ऊगा नहीं है, रात जा चुकी है, इस काल को हिंदू संध्या कहते हैं। इसलिए हिंदू अपनी प्रार्थना को भी संध्या कहते हैं। या फिर सांझ को जब सूरज डूब गया और अभी रात नहीं आ गई। बीच में एक मध्यकाल है, संधि है। उस मध्यकाल में जैसा प्रकाश होता है--तीव्रता शून्य। आग नहीं होती उस प्रकाश में, सिर्फ रोशनी होती है। ठंडा प्रकाश, ठीक वैसा प्रकाश तुम्हारे भीतर है। लेकिन तुम बाहर के प्रकाश के इतने आदी हो गये हो। तुम्हें खयाल होगा, कभी गर्मी के दिनों में थके-मांदे रास्ते की यात्रा से, सूरज की तेज जलती आग के नीचे तुम घर लौटे हो। भीतर गये हो, एकदम अंधकार मालूम होता है। आंख बाहर के सूरज से इतनी आदी हो गई, फिर तुम थोड़ा विश्राम करते हो, सुस्ताते हो, धीरे-धीरे-धीरे आंख भीतर के प्रकाश को देखना शुरू करती है। धीरे-धीरे अंधेरा मिटता है, कमरे में एक रोशनी आती है। ऐसे ही भीतर जब तुम पहली दफे आंख बंद करोगे, सिर्फ अंधेरा पाओगे। और यह अंधेरा बहुत घना मालूम होगा। क्योंकि जन्मों-जन्मों से तुम बाहर ही यात्रा कर रहे हो। क्षण भर तुम आंख बंद करते हो, अंधेरा पाकर आंख खोल कर फिर बाहर चले जाते हो। कहते हो, ये बुद्ध और महावीर पर भरोसा नहीं आता, भीतर तो अंधेरा है। वक्त लगेगा। आंख को थोड़ा राजी होने दो। आंख को थोड़ा एडजस्ट--समायोजित होने दो। इसलिए ध्यान में समय लगता है। और प्रतीक्षा जरूरी है। जैसे-जैसे तुम्हें भीतर सांध्यकालीन प्रकाश दिखाई पड़ेगा, जिसमें आग नहीं है, सिर्फ रोशनी है, आभा है; वैसे-वैसे दीये से संबंध टूटेगा, प्रकाश से संबंध जुड़ेगा। गेयर बदलेगा भीतर, और एक बार ज्योति के साथ एक हुए फिर तुम्हारे तले कोई अंधेरा नहीं है। फिर न तुम केवल खुद प्रकाश से भरे रहोगे, तुम्हारा प्रकाश बाहर भी गिरेगा। तुम जिसके पास जाओगे उसको भी तुम्हारे प्रकाश का दान मिलेगा
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🍄 *जो सार्थक से जुड़ गया वो खुद ही व्यर्थ से अलग हो गया!*🍄 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 * *संन्यासी परमात्मा के प्रेम में डूबा हुआ दीवाना है। और एक बड़े मजे की घटना घटती है कि जिसका परमात्मा से राग हो* *जाता है उसका संसार से राग टूट जाता है। टूट ही जाता है! सार्थक से जो जुड़ गया उसका व्यर्थ से संबंध न रह जाएगा। जिसे सार्थक दिखाई पड़ने लगा उससे व्यर्थ अपने-आप छूट जाएगा। छोड़ना भी नहीं पड़ता, छूट जाता है। और तभी मजा है, जब छूट जाए; छोड़ना पड़े तो मजा नहीं। छोड़ना पड़े तो समझना कि कच्चे थे अभी। कच्चे फल को तोड़ना पड़ता है वृक्ष से। पका फल अपने से गिर जाता है। पके फल के गिरने में एक सौंदर्य है, एक प्रसाद है। वृक्ष को पता भी नहीं चलता कब गिर गया, कोई घाव भी नहीं छूटता पीछे। कच्चे फल को तोड़ते हो तो घाव पीछे छूटता है। किसी चीज को कच्चा मत तोड़ देना, पकने दो–और गिरने दो अपने से।* *मेरे जीवन-चिंतना का यह आधारभूत सूत्र है: सत्य की तरफ आंखें उठाओ, असत्य से आंखें अपने-आप हट जाएंगी। रोशनी से प्रेम लगाओ, अंधेरे से प्रेम अपने-आप विदा हो जाएगा।* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 🙏😊🍄 *G.N freinds..*
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*आदमी की खोज उस घर की खोज है जो सच में घर हो , सराय न हो । यहां तो सब सरायें हैं , धर्मशालाएं हैं-- बस रैनबसेरा है । सुबह हुई , चल पड़ना होगा । बहुत मोह मत लगा लेना । यह छूट ही जाना है । तुमसे पहले बहुत लोग यहां ठहरे और गए ; तुम भी उसी कतार में हो । इसलिए चाहे यहां कितना ही धन हो , कितना ही पद हो , प्रतिष्ठा हो ; फिर भी तृप्ति नहीं मिलती । तृप्ति यहां मिलती ही नहीं । तृप्ति का संसार से कोई संबंध ही नहीं है । अक्सर ऐसा होता है कि गरीब को तो थोड़ी आशा भी रहती है , अमीर की आशा भी टूट जाती है । गरीब को तो लगता है कि एक मकान होगा अपना , तो शांति होगी । थोड़ा धन-संपत्ति होगी ; सुविधा होगी ; फिर सुख और चैन से रहेंगे । उसे यह पता ही नहीं है कि सुख-चैन यहां हो नहीं सकता । धर्मशाला में कैसा सुख-चैन ? कब उठा लिए जाओगे...! आधी रात में पुकार लिए जाओगे ..! कब मौत का दूत द्वार पर खड़ा हो जाएगा और दस्तक देने लगेगा--कुछ भी तो नहीं कहा जा सकता ...! यहां चैन कैसे हो सकता है ? बेचैनी यहां स्वाभाविक है....!!
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*बुद्धि अंतर पैदा कर देती है!!* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 बुद्धि हर चीज को दो में बांट देती है। बुद्धि के देखने का ढंग ऐसा है कि बिना बंटे कोई चीज रह नहीं सकती। बुद्धि है विश्लेषण, बुद्धि है भेद, बुद्धि है विभाजन, डिवीजन। इसीलिए हमें जन्म और मृत्यु दो दिखाई पड़ते हैं, बुद्धि से देखने के कारण, अन्यथा दो नहीं हैं। जन्म शुरुआत है, मृत्यु उसी का अंत है; दो छोर हैं एक ही चीज के। हमें सुख और दुख अलग दिखाई पड़ते हैं, बुद्धि के कारण, वे दो नहीं हैं। इसीलिए तो दुख सुख बन जाते हैं, सुख दुख बन जाते हैं। आज जो सुख मालूम पड़ता है, सुबह दुख हो सकता है। सुबह तो बहुत दूर है, अभी मालूम होता था सुख, अभी दुख हो सकता है। यह असंभव होना चाहिए। अगर सुख और दुख दो चीजें हैं अलग अलग, तो सुख कभी दुख नहीं होना चाहिए, दुख कभी सुख नहीं होना चाहिए। पर हर घड़ी यह बदलाहट चलती रहती है। अभी प्रेम है, अभी घृणा हो जाती है। अभी लगाव लगता था, अभी विकर्षण हो जाता है। अभी मित्रता लगती थी, अभी शत्रुता हो जाती है। ये दो चीजें नहीं हैं, नहीं तो रूपातरण असंभव होना चाहिए। जो अभी जिंदा था, अभी मर गया! तो जीवन और मृत्यु ये अलग चीजें नहीं होनी चाहिए, नहीं तो जीवित आदमी मर जाए! कैसे? जीवन मृत्यु में कैसे बदल जाएगा? हमारी भूल है कि हमने दो में बांट रखा है। हमारे देखने का ढंग ऐसा है कि चीजें दो में बंट जाती हैं। इस देखने के ढंग को जो एक तरफ रख देता है, बुद्धि को जो हटा देता है अपनी आंख के सामने से और बिना बुद्धि के जगत को देखता है, तो सारे भेद तिरोहित हो जाते हैं। अद्वैत का अनुभव उन्हीं लोगों का अनुभव है, वेदांत का सार अनुभव उन्हीं लोगों का अनुभव है, जिन्होंने बुद्धि को एक तरफ रख कर जगत को देखा। फिर जगत जगत नहीं, ब्रह्म हो जाता है। और तब जो भीतर जीव मालूम पड़ता था और वहां ब्रह्म मालूम पड़ता था, वे भी एक चीज के दो छोर रह जाते हैं। _जो मैं यहां हूं भीतर, और जो वहां फैला है सब ओर वह, दोनों एक ही हो जाते हैं तत्त्वमसि। तब अनुभव होता है कि मैं वही हूं, उसका ही एक छोर हूं। वह जो आकाश बहुत दूर तक चला गया है, वही आकाश यहां मेरे हाथ को भी छू रहा है। वही हवा का विस्तार जो सारी पृथ्वी को घेरे हुए है, वही मेरी श्वास बन कर भीतर प्रवेश कर रहा है। इस सारे अस्तित्व के प्राण कहीं धड़क रहे हैं, जिनसे यह सारा जीवन है तारे चलते हैं और सूरज ऊगता है, और चांद में रोशनी है, और वृक्षों में फल लगते हैं, और पक्षी गीत गाते हैं, और आदमी जीता है सब के भीतर छिपा हुआ जो प्राण धड़क रहा होगा कहीं विश्व के केंद्र में, और मेरे शरीर में जो हृदय की धीमी धीमी धड़कन है, वे एक ही चीज के दो छोर हैं। वे दो नहीं हैं।_
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🌱🙏 *सुप्रभात... GOOD MORNING.....* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 *सिकन्दर उस जल की तलाश में था, जिसे पीने से मानव अमर हो जाते हैं.!* *दुनियाँ भर को जीतने के जो उसने आयोजन किए, वह अमृत की तलाश के लिए ही थे !* *काफी दिनों तक देश दुनियाँ में भटकने के पश्चात आखिरकार सिकन्दर ने वह जगह पा ही ली, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति होती !* *वह उस गुफा में प्रवेश कर गया, जहाँ अमृत का झरना था, वह आनन्दित हो गया !* *जन्म-जन्म की आकांक्षा पूरी होने का क्षण आ गया, उसके सामने ही अमृत जल कल - कल करके बह रहा था, वह अंजलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि तभी एक कौआ 🦅 जो उस गुफा के भीतर बैठा था, जोर से बोला, ठहर, रुक जा, यह भूल मत करना...!’* *सिकन्दर ने 🦅कौवे की तरफ देखा!* *बड़ी दुर्गति की अवस्था में था वह कौआ 🦅!* *पंख झड़ गए थे, पँजे गिर गए थे, अंधा भी हो गया था, बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था !* *सिकन्दर ने कहा, ‘तू रोकने वाला कौन...?’* 🦅 *कौवे ने उत्तर दिया, ‘मेरी कहानी सुन लो...मैं अमृत की तलाश में था और यह गुफा मुझे भी मिल गई थी !, मैंने यह अमृत पी लिया !* 🦅 *अब मैं मर नहीं सकता, पर मैं अब मरना चाहता हूँ... !* 🦅 *देख लो मेरी हालत...अंधा हो गया हूँ, पंख झड़ गए हैं, उड़ नहीं सकता, पैर गल गए हैं, एक बार मेरी ओर देख लो फिर उसके बाद यदि इच्छा हो तो अवश्य अमृत पी लेना!* 🦅 *देखो...अब मैं चिल्ला रहा हूँ...चीख रहा हूँ...कि कोई मुझे मार डाले, लेकिन मुझे मारा भी नहीं जा सकता !* 🦅 *अब प्रार्थना कर रहा हूँ परमात्मा से कि प्रभु मुझे मार डालो !* 🦅 *मेरी एक ही आकांक्षा है कि किसी तरह मर जाऊँ !* 🦅 *इसलिए सोच लो एक बार, फिर जो इच्छा हो वो करना.’!* 🦅 *कहते हैं कि सिकन्दर सोचता रहा....बड़ी देर तक.....!* *आखिर उसकी उम्र भर की तलाश थी अमृत !*💧 *उसे भला ऐसे कैसे छोड़ देता !* *सोचने के बाद फिर चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया, बिना अमृत पिए !* *सिकन्दर समझ चुका था कि जीवन का आनन्द ✨उस समय तक ही रहता है, जब तक हम उस आनन्द को भोगने की स्थिति में होते हैं!* *इसलिए स्वास्थ्य की रक्षा कीजिये !* *जितना जीवन मिला है,उस जीवन का भरपूर आनन्द लीजिये !* ❣🥀 *हमेशा खुश रहिये* *दुनियां में सिकन्दर कोई नहीं वक्त सिकन्दर होता है!*
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🕸 *सत्य को प्रेम की आँखों से देखो !!*🕸 घूंघट का पट खोल रे, तो को पीव मिलेंगे। कबीर के लिए परमात्मा प्रिय है, प्रीतम है, पिया है। सत्य को जब प्रेम की आंख से देखा जाता है, तो सत्य फिर एक रूखी—सूखी दार्शनिक धारणा नहीं होती; फिर सत्य प्रियतम होता है। फिर वही प्यारा होता है; काफी कुछ भी प्यारा नहीं रह जाता। और जहां भी वह होता है, वह सभी प्यारा हो जाता है। तो एक तो यह बात खयाल में लें कि सत्य को अगर तुमने एक रूखी—सूखी धारणा की तरह खोजना चाहा...जैसे विज्ञान की खोज है, वह रूखी—सुखी खोज है। उससे खोजी भीगता नहीं। उससे खोजी वही का वही रहता है। उसने खोजी के जीवन में रूपांतरण नहीं आता है, आर्द्रता नहीं आती, गीलापन नहीं आता। खोजी रूखा ही बना रहता है। एक दार्शनिक खोजता है सत्य को; तर्क जुटाता है, बड़े सिद्धांतों के जाल खड़े करता है, सब तरह की परीक्षाएं करता है विचार से—उसका जीवन भी रूखा—सूखा रह जाता है। वह ऐसा वृक्ष है, जिस पर हरे पत्ते कभी नहीं लगते; जिसमें कभी कभी फूल नहीं आते। वह सूखी शाखाएं हैं, जिनमें कुछ नहीं लगता। शास्त्र का ढेर बढ़ता जाता है, शब्दों के जाल बढ़ते जाते हैं और भीतर के प्राण सूखते जाते हैं। अगर तुम दार्शनिक के शब्द भी सुनो तो भी तुम्हें रेगिस्तान का स्वाद देंगे। सब सूखा, तप्त! उनसे कभी भी तुम्हें जीवन की हरियाली न उठती हुई मालूम पड़ेगी। कबीर दार्शनिक नहीं हैं—कबीर प्रेमी हैं। उनके शब्दों में बड़ा रस है। और वह रस खबर देता है कि भीतर की किसी रसधार में डूबते हुए वे शब्द आए हैं। इसलिए हमने तो ऋषि को कवि कहा है। संस्कृत में ऋषि और कवि दोनों शब्दों का एक ही अर्थ है। धीरे—धीरे हमें दो अर्थ करने पड़े। क्योंकि ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने बिना सत्य को जाने भी कविताएं लिखी हैं। कविताएं कितनी भी प्यारी हों उनकी, उनमें कोई आत्मा नहीं है। इसलिए वे खाली हैं। ऊपर काफी रंग—रौनक है; भीतर प्राण नहीं है। घर बहुत सुंदर है, निवासी नहीं है। देह बिलकुल ठीक है, लेकिन प्राण—पखेरू उड़ चुके हैं, या कभी थे ही नहीं। पश्चिम में मुर्दे को भी लोग ले जाते हैं तो खूब सजाकर ले जाते हैं। स्त्री मर जाती है तो भी उसके होंठ पर लिपिस्टिक लगा देते हैं, आंख की पलकों पर काजल लगा देते हैं, गाल पर लाली लगा देते हैं: मरी हुई स्त्री बड़ी जीवित मालूम पड़ती है। कवियों की कविताएं ऐसी ही हैं; वहां भीतर कुछ आत्मा नहीं है, ऊपर काफी रंग रौनक है। इसलिए अक्सर एक बात खयाल रखना, किसी कवि की कविता पसंद आ जाए तो भी कवि को खोजने मत जाना, नहीं तो कवि को देखकर बड़ी निराशा होगी। कविता तो बड़ी ऊंची मालूम पड़ती थी, और कवि बिलकुल साधारण मालूम पड़ेगा: कोई ऊंचाई नहीं, कोई गहराई नहीं। कविता पसंद आ जाए तो कवि के पास मत जाना। क्योंकि वहां व्यक्ति नहीं है। वहां सिर्फ एक कौशल है, एक तकनीक है। वह आदमी लय, छंद, शब्द, भाषा का ज्ञाता है, और इनको इस भांति बांध सकता है कि एक संगीत का भ्रम पैदा हो जाए। लेकिन सब ऊपर—ऊपर है—लाश पर लगा हुआ लिपस्टिक है; लाश की आंखों पर लगा हुआ काजल है। और स्त्री बिलकुल सुंदर मालूम पड़ती है। और ऐसी लगती है कि कभी—कभी कश्मीर से यात्रा करके लौटी है। लेकिन भीतर सब मृत है। भीतर कोई जीवित नहीं है। इस स्त्री के प्रेम में मत पड़ जाना। इस स्त्री को सिवाय दफनाने के और कोई उपाय नहीं है। कहीं खलील जिब्रान ने एक वचन लिखा है कि प्रेमी अपनी प्रेयसी में वही देखता है, जो अगर परमात्मा की मर्जी पूरी होती तो वह स्त्री होती। प्रेमी अपनी प्रेयसी में वही देखता है, जो स्त्री की अनंत संभावना है; वह उसे आज देखता है, जो वह कल हो सकती है—अगर परमात्मा की मर्जी पूरी हो पाए। वह उस फूल को नहीं देखता है जो सामने है; वह उस फूल को देख सकता है जो हो सकता है इस फूल से। वह सारी संभावनाओं को मौजूद देखता है। वह सारे भविष्य को वर्तमान देखता है।
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एक ही प्रार्थना है। एक ही निमंत्रण है। एक ही अभीप्सा है भक्त की कि यह मेरे छोटे से हृदय में, यह बूंद जैसे हृदय में तू अपने सागर को आ जाने दे। बूंद में सागर उतर सकता है। बूंद ऊपर से ही छोटी दिखाई पड़ती है। बूंद के भीतर उतना ही आकाश है, जितना बूंद के बाहर आकाश है। देर है अगर कुछ तो हार्दिक निमंत्रण की देर है। बाधा है अगर कुछ तो बस इतनी ही कि तुमने पुकारा नहीं। परमात्मा तो आने को प्रतिपल आतुर है, पर बिन बुलाए आए भी तो कैसे आए? और बिन बुलाए आए तो तुम पहचानोगे भी हनीं। बिन बुलाए आए तो तुम दुतकार दोगे। तुम बुलाओगे प्राणपण से। रोआं-रोआं तुम्हारा प्रार्थना बनेगा, धड़कन-धड़कन तुम्हारी प्यास बनेगी। तुम प्रज्वलित हो उठोगे। एक ही अभीप्सा रह जाएगी। तुम्हारे भीतर उसे पाने की। उसी क्षण क्रांति घट जाती है। उसी क्षण उसका आगमन हो जाता है। वह तो आया ही हुआ था, बस तुम मौजूद नहीं थे। वह तो सामने ही खड़ा था, पर तुमने आंखें बंद कर रखी थीं। परमात्मा दूर नहीं है, तुम उससे बच रहे हो। परमात्मा दूर नहीं है, तुम सदा उसकी तरफ पीठ कर रहे हो। और कारण है। तुम्हारा बचना भी अकारण नहीं है। बूंद डरती है कि अगर सागर उतर आया, तो मेरी बिसात क्या! मैं गई! अगर सागर आया तो मैं मिटी। वही भय है कि कहीं मैं मिट न जाऊं। वही भय है कि कहीं मैं समाप्त न हो जाऊं! कहीं मेरी परिभाषा ही अंत पर न आ जाए! मेरा अस्तित्व ही संकट में न पड़ जाए! इससे तुम पुकारते नहीं प्राणपण से। तुम प्रार्थना भी करते हो तो थोथी। तुम प्रार्थना भी करते हो तो झूठी। तुम प्रार्थना भी करते हो तो औपचारिक। और प्रार्थना कहीं औपचारिक हो सकती है? प्रेम कहीं उपचार हो सकता है? तुम्हारी औपचारिकता ही तुम्हारी उपाधि बन गई है, तुम्हारी बीमारी बन गई। कब तुम सहज होकर पुकारोगे? कब तुम समग्र होकर पुकारोगे? और बार-बार नहीं पुकारना पड़ता है। एक पुकार भी काफी है। लेकिन तुम पूरे के पूरे उस पुकार में सम्मिलित होने चाहिए। जरा सा भी अंश तुम्हारा पुकार के बाहर रह गया, तो पुकार काम न आएगी।
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*टाल रहे हो बिना इस बात को समझे कि इस देह का कोई भरोसा नहीं है । यह एक क्षण भी टिकेगी या नहीं ? कल सुबह होगी या नहीं ? जो समझते हैं वे हर रात परमात्मा को धन्यवाद देकर सोते हैं कि आज का दिन तूने दिया , धन्यवाद ! अब कल सुबह उठूं या न उठूं , इसलिए आखिरी नमस्कार । जब सुबह उठते हैं तो जो समझदार हैं वे फिर परमात्मा को धन्यवाद देते हैं कि चमत्कार ! कि मैं तो सोचता था कि आखिरी नमस्कार हो गया , फिर आज उठ आया हूं , फिर तूने सूरज दिखाया , फिर पक्षियों के गीत सुनाई पड़ रहे हैं , धन्यवाद ! इस आखिरी दिन के लिए फिर धन्यवाद ! सुबह भी आखिरी दिन है , सांझ भी आखिरी दिन है , ऐसा ही समझदार आदमी जीता है : यही उसकी बंदगी है । मूढ़ की तो न आखिरी रात होती है न आखिरी दिन होता है ; वह तो मरते-मरते तक योजनाएं बनाता रहता है , आखिरी क्षण तक मरते-मरते हिसाब लगाता रहता है । मौत द्वार पर आ जाती है , फिर भी उसे दिखाई नहीं पड़ती । ऐसा हमारा अंधापन है.......!!
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*💫दुख पैदा होता है क्योंकि हम बदलाव को होने नहीं देते💫* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 हम पकड़ते हैं, हम चाहते हैं कि चीजें स्थिर हों। यदि तुम स्त्री को प्रेम करते हो तो तुम चाहते हो की आने वाले कल में भी वह तुम्हारी रहे, वैसी ही जैसी कि वह तुम्हारे लिए आज है। इस तरह से दुख पैदा होता है। कोई भी आने वाले क्षण के लिए सुनिश्चित नहीं हो सकता--आने वाले कल कि तो बात ही क्या करें? होश से भरा व्यक्ति जानता है कि जीवन सतत बदल रहा है। जीवन बदलाहट है। यहां एक ही चीज स्थायी है, और वह है बदलाव। बदलाव के अलावा हर चीज बदलती है। जीवन की इस प्रकृति को स्वीकारना, इस बदलते अस्तित्व को उसके सभी मौसम और मनोदशा के साथ स्वीकारना, यह सतत प्रवाह जो एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता, आनंदपूर्ण है। तब कोई भी तुम्हारे आनंद को विचलित नहीं कर सकता। स्थाई हो जाने की तुम्हारी चाह तुम्हारे लिए तकलीफ पैदा करती है। यदि तुम ऐसा जीवन जीना चाहते हो जिसमें कोई बदलाव न हो--तो तुम असंभव की कामना करते हो। होश से भरा व्यक्ति इतना साहसी होता है कि इस बदलती घटना को स्वीकार लेता है। उस स्वीकार में आनंद है। तब सब कुछ शुभ है। तब तुम कभी भी निराशा से नहीं भरते।
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*शुभ और अशुभ की कसौटी बाहर नहीं भीतर है!!* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 *आज जो नैतिक है, कल अनैतिक हो जाएगा। नीति बदलती है। इसलिए नीति के साथ शुभ को एक मत समझ लेना। शुभ शाश्वत है। शुभ न हिंदू का, न मुसलमान का, न जैन का, न ईसाई का, शुभ तो परमात्मा से संबंधित होने का नाम है। शुभ सासारिक धारणा नहीं है, न सामाजिक धारणा है। शुभ तो अंतसछंद की प्रतीति है। शांडिल्य से पूछो, या अष्टावक्र से, या मुझ से, उत्तर यही होगा कि जिस बात से तुम्हारे भीतर के छंद में सहयोग मिले, वह शुभ। और जिस बात से तुम्हारे भीतर के छंद में बाधा पड़े, वह अशुभ।* *जिससे तुम्हारा अंतस गीत बढ़े वह शुभ, जिससे तुम्हारा अंतस गीत छिन्नछिन्न हो, खंडित हो, वह अशुभ। जिससे तुम समाधि के करीब आओ, वह शुभ, और जिससे तुम समाधि से दूर जाओ, वह अशुभ। कसौटी भीतर है, कसौटी बाहर नहीं है।* 🕸 *ओशो*🕸 🙏😊सुप्रभात मित्रों
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🕸 *देहाभिमान है क्या*🕸 मनुष्य के व्यक्तित्व को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला हिस्सा है: देह। देह सत्य है। विज्ञान देह की खोज है, पदार्थ की। दूसरा देह के बाद तल है मन का। मन न तो सत्य है न असत्य; आभास है। मिथ्या है, असत्य नहीं। मिथ्या शब्द को ठीक से समझ लेना। मिथ्या का अर्थ होता है जो सत्य जैसा भासे लेकिन सत्य हो न। जैसे सांझ के धुंधलके में, कि भोर के कुहासे में, राह पर पड़ी हुई रस्सी सांप जैसी मालूम पड़ जाए और तुम भाग खड़े होओ। जहां तक तुम्हारे भागने का संबंध है, रस्सी ने वही काम कर दिया जो सांप करता। यह भी हो सकता है तुम गिर पड़ो, हड्डी-पसली तोड़ लो। यह भी हो सकता है कि तुम इतने घबड़ा जाओ कि हृदय का दौरा पड़ जाए, कि मर ही जाओ। इसका अर्थ हुआ कि जो सांप नहीं था उसने तुम्हारे प्राण ले लिए। जहां तक परिणाम का संबंध है वहां तक तो सांप सत्य मालूम होता है.............
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🕸 *किसी का अनुगमन या* *किसी का अनुशरण मत करो!* *अंतर के स्वर सुनो!!*🕸 अस्तित्व के साथ जियो और चीजोें को खुद अपने आप घटने दो। यदि कोई तुम्हारा सम्मान करता है,तो यह उसका ही निर्णय है, तुम्हारा उससे कोई संबंध नही। यदि तुम उससे अपना संबंध जोड़ते हो,तो तुम असंतुलित और बेचैन हो जाओगे, और यही कारण है कि यहाँ हर कोई मनोरोगी है। और तुम्हारे चारों तरफ घिरे बहुत से लोग तुमसे यह अपेक्षाएँ कर रहे हैं कि तुम यह करो, वह मत करो। इतने सारे लोग और इतनी सारी अपेक्षाएँ और तुम उन्हे पूरा करने की कोशिश कर रहे हो। तुम सभी लोगों और उनकी सभी अपेक्षाओं को पूरा नही कर सकते। तुम्हारा पूरा प्रयास तुम्हे एक गहरे असंतोष से भर देगा और कोई भी संतुष्ट होगा ही नही। तुम किसी को संतुष्ट कर ही नही सकते, केवल यही संभव है कि केवल तुम स्वयम् ही संतुष्ट हो जाओ। और यदि तुम अपने से संतुष्ट हो गये, तब थोड़े से लोग तुमसे संतुष्ट होंगे, लेकिन इससे तुम्हारा कोई संबंध न हो। तुम यहाँ किन्ही और लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करने, उनके नियमों और नक्शों के अनुसार उन्हे संतुष्ट करने के लिये नही हो। तुम यहाँ अपने अस्तित्व को परिपूर्ण जीने के लिये आये हो। यही सभी धर्मों में सबसे बड़ा और पूर्ण धर्म है कि तुम अपने होने में परिपूर्ण हो जाओ । यही तुम्हारी नियति या मंजिल है, इससे च्युत नही होना है। इससे बढ़कर और कुछ मूल्यवान नही। किसी का अनुगमन और अनुसरण न कर अपने अन्त: स्वर को सुनो। एक बार भी यदि तुमने अपने अन्त: स्वर का अनुभव कर लिया, तो फिर नियमों और सिद्धाँतों की कोई जरूरत रहेगी ही नही। तुम स्वयम् अपने आप में ही एक नियम बन जाओगे।"*
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"ईश्वर बड़ा या विज्ञान " आज कल बहुत सी जगहों पे लिखा होता है, "आप कैमरे की नज़र में है" यह पढते ही व्यक्ति होशियार हो जाता है, और ग़लत काम करने से परहेज़ करता है, जबकि यह इंसान द्वारा बनाया एक उपकरण है ! आस्तिक कहते है कि हम हर समय ईश्वर की नज़र में हैं, और वहाँ की नज़र न ख़राब होती है, न बंद होती है, न किसी के नियंत्रण मे होती है, यानी बचने का कोई तरीका नहीं है। फ़िर भी लोग CCTV से ज्यादा डरते है और ईश्वरीय कैमरे से बिलकुल डरते नहीं , क्योंकि इंसान सच्चाई जान चुका है कि ऐसी कोई शक्ति का वास्तव में अस्तित्व ही नहीं है, लेकिन CCTV किसी को छोडेगा नहीं ! सोचनेवाली व (हंसनेवाली ) भी बात तो ये है की धार्मिक स्थलों पे भी CCTV लगाया होता है ! ध्यान रहे आप हमेशा CCTV की नज़र में है ।। . अंधविश्वास भगाओ देश बचाओ तर्क करो
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🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 *थोड़ीअसुविधा और दुख तकलीफ में जीना सीखो क्योंकि जितनी तुम अपने आसपास ऐसा वातावरण निर्मित कर लेते हैं उतने ही आपके भीतर की सजगता कम हो जाती है* *तुमने कभी ख्याल किया छोटी सी बीमारी छोटी से कोई बात भी तुम्हें कितनी पीड़ा देती है और इससे भी बड़ी बीमारी और तकलीफें दूर के आदिवासी गांव में किसी गरीब आदमी को हो जाएं तो उन्हें इतनी पीड़ा नहीं होती वह अपनी असुविधा में भी वह अपने भीतर की सजगता से इन सबसे से लड़ लेता है* *और हिम्मत से इन सबका सामना करता है।* *साधना के मार्ग पर जो इस पूरे अस्तित्व से थोड़ी सी भी असुविधा और दुख तकलीफों को स्वीकार करने को राजी नहीं उसका उस विराट अस्तित्व से तादात्म्य कैसे बनेगा* *साधक वही जो हरअसुविधा और कठिनायियों में जीने को राजी है* *और जीवन मे मिलता भी सब उसी को ही है।* 🙏🙏😊😊🌷💖 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸
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🕸 *निराशा दूर करने की विधि।*🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 *जब भी तुम बैठे हो और तुम्हें करने को कुछ न हो बस अपने नीचे के जबडे को शिथिल कर लो और मुंह को हलका सा खोल लो। मुंह से श्वास लेना शुरू कर दो, लेकिन गहरी नही। बस शरीर को श्वास लेने दो ताकि श्वास उथली हो जाए और वह ज्यादा से ज्यादा उथली होती जाएगी। ओर जब तुम महसूस करो कि श्वास काफी उथली हो गई है ओर मुंह खुला है और तुम्हारा जबडा शिथिल है तब तुम्हारा शरीर बहुत विश्रामपूर्ण महसूस करेगा।* *उस क्षण में, एक मुस्कान महसूस करो - चेहरे पर नही* *बल्कि अपने पूरे भीतरी अस्तित्व पर . . . और तुम ऐसा कर सकोगे। यह ऐसी मुस्कान नही हैं जो होठो पर आती है - यह अस्तित्वगत मुस्कान है, जो सिर्फ भीतर फैलती है। इसे प्रयोग करो और तुम जान लोगे यह क्या* *है. . . क्योकि यह समझाई नही सकती। चेहरे पर, होठों से* *मुस्कुराने की कोई जरूरत नहीं, बल्कि ऐसे मुस्कुराओ जैसे तुम पेट से मुस्कुरा रहे हो; जैसे पेट* *मुस्करा रहा है। और यह एक मुस्कान है, हंसी नहीं; इसलिए यह बहुत कोमल, नाजुक और भंगुर है - जैसे एक गुलाब का फूल पेट में खिल रहा हो और उसकी सुगंध पूरे शरीर पर फैल रही हो।* *एक बार तुम जान लो कि यह मुस्कान क्या है, तो तुम चौबीस घंटे आनंदित रह सकते हो। और जब भी तुम्हे लगे कि वह आनंद खो रहा है, बस आंखे बंद कर लो और उस मुस्कान को फिर से पकड लो और वह वहां होगी। और दिन में जितनी बार भी तुम चाहो उस मुस्कान को पकड सकते हो।* *वह सदा ही वहां है।* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🙏
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🕸 *जीवन एक कोरे कागज की तरह है! जो आप लिखना चाहे वही आपकी कहानी बन जाएगी!!*🕸 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 जीवन व्यर्थ है , ऐसा मत कहो ऐसा कहो कि मेरे जीने के ढंग में क्या कहीं कोई भूल थी ? क्या कहीं कोई भूल है कि मेरा जीवन व्यर्थ हुआ जा रहा है ? जीवन तो कोरा कागज है ; जो लिखोगे वही पढोगे l गालिया लिख सकते हो , गीत लिख सकते हो l और गालिया भी उसी वर्णमाला से बनती है जिससे गीत बनते है l वर्णमाला तो निरपेक्ष है , निष्पक्ष है l जिस कागज पर लिखते हो वह भी निरपेक्ष , निष्पक्ष l जिस कलम से लिखते हो , वह भी निरपेक्ष ,वह भी निष्पक्ष। सब दांव तुम्हारे हाथ है l तुमने इस ढंग से जीया होगा , इसलिए व्यर्थ मालूम होता है l तुम्हारे जीने में भूल है l और जीवन को गाली मत देना l यह बड़े मजे की बात है l लोग कहते है , जीवन व्यर्थ है l यह नहीं कहते कि हमारे जीने का ढंग व्यर्थ है l और तुम्हारे तथाकथित साधु संत, महात्मा भी तुमको यही समझाते है की जीवन व्यर्थ है l मैं तुमसे कुछ और कहना चाहता हूं , मैं कहना चाहता हूं , जीवन न तो सार्थक है , न व्यर्थ ; जीवन तो निष्पक्ष है l जीवन तो कोरा आकाश है , उठाओं तूलिका , भरो रंग l चाहो तो इंद्रधनुष बनाओ और चाहो तो कीचड़ मचा दो l कुशलता चाहिए l अगर जीवन व्यर्थ है तो उसका अर्थ यह है कि तुमने जीवन को जीने की कला नहीं सीखी ; उसका अर्थ है कि तुम यह मान कर चले थे कि कोई जीवन में रेडीमेड अर्थ होगा l जीवन कोई रेडीमेड कपडे नहीं है कि गए और तैयार कपडे मिल गए l जिंदगी से कपडे बनाने पड़ते है l फिर जो बनाओगे वही पहनना पड़ेगा वाही ओढ़ना पड़ेगा , और कोई दूसरा तुम्हारी जिंदगी में कुछ भी नहीं कर सकता l कोई दूसरा तुम्हारे कपडे नहीं बना सकता l जिंदगी के मामले में तो अपने कपडे खुद ही बनाने होते है l
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🕸 *सिर्फ प्रवेश द्वार ही नही! निकास द्वार के बारे में भी सोचो!!*🕸 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 अमृत की खोज धर्म है। इस जीवन में तो मृत्यु है ही। और जब तक तुम समझते हो, यही जीवन तुम्हारा सब कुछ है, तब तक तुम मृत्यु से भयभीत रहोगे; तब तक तुम ज्वालामुखी पर बैठे हो, किसी भी क्षण मौत हो सकती है। और होगी ही, एक क्षण का भरोसा नहीं है! फकीर हुआ एक सूफी बायजीद। यात्रा पर जा रहा था तीर्थ की, हज करने जा रहा था। सस्ते जमाने थे; एक पैसे में एक दिन का भोजन और एक दिन का खर्च पूरा हो जाता था। तो उसने एक पैसा जेब में रखा लिया और यात्रा पर निकलने को ही था उसके एक धनपति भक्त ने कहा कि यह तुम क्या कर रहे हो? एक पैसा लेकर हज करने जा रहे हो, कभी सुना? वह साथ में एक थैली ले आया था, जिसमें बहुत अशरफियां थीं। उसने कहा, ये साथ में रख लो। एक पैसे से कहीं हज हुई है! इतनी लंबी यात्रा, आना—जाना, कम से कम छह महीने लगनेवाले हैं। बायजीद ने कहा, रख लूंगा तुम्हारी थैली भी, लेकिन तुम मुझे पहले पक्का भरोसा दिला दो कि मैं एक दिन से ज्यादा जियूंगा? कल भी मैं रहूंगा। अगर तुम मुझे आश्वासन दे दो कि कल भी मैं रहूंगा, तुम्हारी थैली स्वीकार! तो उस धनपति ने कहा, मैं कैसे आश्वासन दे सकता हूं कि कल आप रहेंगे? कल का किसको भरोसा है! तो बायजीद ने कहा, यह एक पैसा आज के लिए काफी है। कल का जब भरोसा ही नहीं तो कल का इंतजाम...। बायजीद की भीड़ में एक फकीर और बैठा हुआ था। बायजीद तब ज्ञान को उपलब्ध नहीं हुआ था, लेकिन फिर भी ज्ञान के करीब ही करीब रहा होगा, ठीक कगार पर रहा होगा; अभी छलांग नहीं लग गयी थी। तभी तो हज की यात्रा को जा रहा था। कहीं ज्ञानी तीर्थयात्रा को गए हैं! मगर फिर भी समझ गहरी थी, तब तो धनपति के पैसे को कह दिया कि सम्हालकर रख लो, तुम्हारे काम पड़ेगा। मुझे तो कल का भरोसा कोई दिलाये तभी कल कि चिंता हो। एक फकीर हंसने लगा और भीड़ से उठ गया। बायजीद उसके पीछे दौड़ा और कहा कि तुम हंसे क्यों? उसने कहा, जब एक दिन का भरोसा है तो कल के भरोसे में क्या दिक्कत है? जब एक पैसा रख सकते हो, तो बात तो हो गई। फिर एक पैसा रखो कि करोड़ पैसा रखो, क्या फर्क पड़ता है? आज का भरोसा है? और जब एक पैसे पर भरोसा है तो परमात्मा पर कितना भरोसा है? है ही नहीं! बायजीद ने वह पैसा भी वहीं गिरा दिया। और कहते हैं, उस पैसे के गिरने के साथ बायजीद ज्ञान को उपलब्ध हुआ। एक क्षण का भरोसा नहीं, और इंतजाम कितना बड़ा! इंतजाम करते—करते ही तुम समाप्त हो जाओगे। पैसा, धन तो पेट्रोल की भांति है; वह कोई मंजिल नहीं है। लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं कि वे पेट्रोल इकट्ठा करते चले जाते हैं। उनके घर में पेट्रोल हो जाता है। खुद भी रहने की जगह नहीं रह जाती, वे बाहर हरते हैं। वे यात्रा की तैयारी कर रहे हैं; क्योंकि जब तैयारी पूरी हो जाए तो यात्रा पर जाएंगे! इस संसार में कोई चीज कभी पूरी नहीं होती, इसलिए वह कभी यात्रा पर नहीं जा पाते। वे पेट्रोल इकट्ठा करते—करते मर जाते हैं। धन मंजिल नहीं है। धन मार्ग पर विनिमय का साधन है। और धन पर तुम्हारी पकड़ यह बताती है कि तुम्हें कल का बहुत भरोसा है। क्षण भर भी भरोसे का कोई कारण नहीं, मौत किसी भी क्षण द्वार पर दस्तक दे सकती है। इस जीवन मग तो मौत छिपी है। इस जीवन में तो जन्म के साथ ही मौत तुम्हारे भीतर आ गई है। जन्म की घड़ी में ही तय हो गया कि कैसे तुम मरोगे, कब तुम मरोगे। एक—एक क्रोमोसोम, जिससे शरीर बनता है, उसकी उम्र तय है कि वह सत्तर साल जीएगा कि अस्सी साल जीएगा। बस, उतनी ही तुम्हारी उम्र होगी। थोड़े व्यवस्था से जिए तो थोड़े दिन ज्यादा। थोड़ी अव्यवस्था से जिए तो थोड़े दिन कम। लेकिन आमतौर से उम्र तय हो गई; जन्म के साथ मौत भीतर प्रवेश कर गई है। प्रवेश द्वार पर ही मत बैठे रहो, निकास का मार्ग भी खोजो! उसी को निर्वाण द्वार कहा है बुद्ध ने। वह सहस्रार!
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*हम जीवित हैं , लेकिन हमें पता नहीं कि जीवन क्या है । इस अज्ञान के कारण ही हमें ज्ञात होता है कि मृत्यु भी घटती है । मृत्यु एक अज्ञान है । जीवन का अज्ञान ही मृत्यु की घटना बन जाती है । काश ! उस समय जीवन से परिचित हो सकें जो भीतर है , तो उसके परिचय की एक किरण भी सदा - सदा के लिए इस अज्ञान को तोड़ देती है कि मैं मर सकता हूं, या कभी मरा हूं , या कभी मर जाऊंगा । लेकिन उस प्रकाश को हम जानते नहीं है जो हम हैं , और उस अंधकार से हम भयभीत होते हैं जो हम नहीं है । उस प्रकाश से परिचित नहीं हो पाते जो हमारा प्राण है , जो हमारा जीवन है जो हमारी सत्ता है ; और उस अंधकार से हम भयभीत होते हैं , जो हम नहीं हैं....!मनुष्य मृत्यु नहीं है , मनुष्य अमृत है । लेकिन हम अमृत की ओर आंख नहीं उठाते है । हम जीवन की तरफ , जीवन की दिशा में कोई खोज ही नहीं करते हैं , एक कदम भी नहीं उठाते हैं । जीवन से रह जाते हैं अपरिचित और इसलिए मृत्यु से भयभीत प्रतीत होते हैं । इसीलिए प्रश्न जीवन और मृत्यु का नहीं है , प्रश्न है सिर्फ जीवन का....!!
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कया शिवलिंग रेडियो एकटिव होता है ??? शिवलिंग पर जल, दूध, दही कयो अर्पित किया जाता है ? शिवलिंग से निकली नाली को लांघा कयो नहीं जाता ??? *🕉शुभ प्रभात🕉* *🚩एक आवश्यक संदेश🚩* *आजकल प्रतिदिन संदेश आ रहे हैं कि महादेव को दूध की कुछ बूंदें चढाकर शेष निर्धन बच्चों को दे दिया जाए। सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन हर हिन्दू त्योहार पर ऐसे संदेश पढ़कर थोड़ा दुख होता है। दीवाली पर पटाखे ना चलाएं, होली में रंग और गुलाल ना खरीदें, सावन में दूध ना चढ़ाएं, उस पैसे से गरीबों की मदद करें। लेकिन त्योहारों के पैसे से ही क्यों? ये एक साजिश है हमें अपने रीति-रिवाजों से विमुख करने की।* *हम सब प्रतिदिन दूध पीते हैं तब तो हमें कभी ये ख्याल नहीं आया कि लाखों गरीब बच्चे दूध के बिना जी रहे हैं। अगर दान करना ही है तो अपने हिस्से के दूध का दान करिए और वर्ष भर करिए। कौन मना कर रहा है। शंकर जी के हिस्से का दूध ही क्यों दान करना?* *आप अपने व्यसन का दान कीजिये दिन भर में जो आप सिगरेट, पान-मसाला, शराब, मांस अथवा किसी और क्रिया में जो पैसे खर्च करते हैं उसको बंद कर के गरीब को दान कीजिये | इससे आपको दान के लाभ के साथ साथ स्वास्थ्य का भी लाभ होगा।* *महादेव ने जगत कल्याण हेतु विषपान किया था इसलिए उनका अभिषेक दूध से किया जाता है। जिन महानुभावों के मन में अतिशय दया उत्पन्न हो रही है उनसे मेरा अनुरोध है कि एक महीना ही क्यों, वर्ष भर गरीब बच्चों को दूध का दान दें। घर में जितना भी दूध आता हो उसमें से ज्यादा नहीं सिर्फ आधा लीटर ही किसी निर्धन परिवार को दें। महादेव को जो 50 ग्राम दूध चढ़ाते हैं वो उन्हें ही चढ़ाएं।* *🚩!!ॐ नम: शिवाय !!🚩* *शिवलिंग की वैज्ञानिकता ....* *भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लें, तब हैरान हो जायेगें ! भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।* *शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे।* *महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले है।* *क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता।* *भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।* *शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।* *तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।* *ध्यान दें, कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।* *जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है।विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।..* *हो सके तो शेयर भी कर दें, दूसरे भक्त भी बाबा के दर्शन का आनंद ले पाएंगे. जय बाबा।* *अपना व्यवहार बदलो हमारे धर्म को बदलने का प्रयास मत करो।* *प्रस्तुतीकरण।*
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🕸 *जो अपने भीतर नही गया वो मंदिर मस्जिद में जा कर भी नही गया।*🕸 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 मंदिर और उपासना-गृहों में बैठने का कोई मूल्य नहीं है और तुम्हारे हाथों में ली गई मालाएं झूठी हैं, जब तक कि विचार के यांत्रिक प्रवाह से तुम मुक्त नहीं होते हो। जो विचारों की तरंगों से मुक्त हो जाता है, वह जहां भी है, वहीं मंदिर में है और उसके हाथ में जो भी कार्य है, वही माला है। एक व्यक्ति ने किसी साधु से कहा था, ''मेरी पत्नी मेरी धर्म-साधना में श्रद्धा नहीं रखती है। आप उसे थोड़ा समझा दें तो अच्छा है।'' दूसरे दिन सुबह ही वह साधु उसके घर गया। घर के बाहर बगिया में ही उसकी पत्नी मिल गई। साधु ने पति के संबंध में पूछा। पत्नी ने कहा, ''जहां तक मैं समझती हूं, इस समय वह किसी चमार की दुकान पर झगड़ा कर रहे हैं।'' सुबह का धुंधलका था। पति पास ही बनाए गए अपने उपासना-गृह में माला फेर रहा था। उससे इस झूठ को नहीं सहा गया। वह बाहर आकर बोला, ''यह बिलकुल असत्य है। मैं अपने मंदिर में था।'' साधु भी हैरान हुआ; पर पत्नी बोली, ''क्या सच ही तुम उपासना-गृह में थे? क्या माला हाथ में, शरीर मंदिर में और मन कहीं और नहीं था?'' पति को होश आया। सच ही वह माला फेरते-फेरते चमार की दुकान में चला गया था। उसे जूते खरीदने थे और रात्रि ही उसने अपनी पत्नी से कहा था कि सुबह होते ही उन्हें खरीदने चला जाऊंगा। फिर विचार में ही चमार से मोल-तोल पर उसका कुछ झगड़ा हो रहा था! विचार को छोड़ो और निर्विचार हो रहो, तो तुम जहां हो प्रभु का आगमन वहीं हो जाता है। उस खोजने तुम कहां जाओगे? और, जिसे जानते ही नहीं उसे खोजोगे कैसे? उसकी खोज से नहीं, स्वयं के भीतर शांति के निर्माण से ही उसे पाया जाता है। कोई आज तक उसके पास नहीं गया है, वरन् जो अपनी पात्रता से उसे आमंत्रित करता है, उसके पास वह स्वयं ही चला आता है। मंदिर में जाना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे स्वयं ही मंदिर बन जाते हैं।
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🌱 *एक कहानी*🌱 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 कि एक बगीचे में एक छोटा सा फूल घास का फूल, दीवाल की ओट में ईटों में दबा हुआ जीता था तूफान आते थे, उस पर चोट नहीं हो पाती थी, ईटों की आड़ थी सूरज निकलता था, उस फूल को नहीं सता पाता था, उस पर ईटों की आड़ थी बरसा होती थी, बरसा उसे गिरा नहीं पाती थी, क्योंकि वह जमीन पर पहले ही से लगा हुआ था पास में ही उस के गुलाब के फूल थे एक रात उस घास के फूल ने परमात्मा से प्रार्थना की कि मैं कब तक घास का फूल बना रहूंगा अगर तेरी जरा भी मुझ पर कृपा है तो मुझे गुलाब का फूल बना दे परमात्मा ने उसे बहुत समझाया कि तू इस झंझट में मत पड़, गुलाब के फूल की बड़ी तकलीफें हैं जब तूफान आते हैं, तब गुलाब की जड़ें भी उखड़ी-उखड़ी हो जाती हैं और जब गुलाब में फूल खिलता है, तो खिल भी नहीं पाता कि कोई तोड़ लेता है और जब बरसा आ आती है तो गुलाब की पंखुड़िया बिखरकर जमीन पर गिर जाती हैं तू इस झंझट में मत पड़, तू बड़ा सुरक्षित है उस घास के फूल ने कहा कि बहुत दिन सुरक्षा में रह लिया, अब मुझे झंझट लेने का मन होता है आप तो मुझे बस गुलाब का फूल बना दें सिर्फ एक दिन के लिए सही, चौबीस घंटे के लिए सही पास-पड़ोस के घास के फूलों ने समझाया, इस पागलपन में मत पड़, हमने सुनी हैं कहानियाँ कि पहले भी हमारे कुछ पूर्वज इस पागलपन में पड़ चुके हैं, फिर बड़ी मुसीबत आती है हमारा जातिगत अनुभव यह कहता है कि हम जहां हैं, बड़े मजे में हैं पर उसने कहा कि मैं कभी सूरज से बात नहीं कर पाता, मैं कभी तूफानों से नहीं लड़ पाता, मैं कभी बरसा को झेल नहीं पाता उनके पास के फूलों ने कहा, पागल, जरूरत क्या है हम ईंट की आड़ में आराम से जीते हैं न धूप हमें सताती, न बरसा हमें सताती, न तूफान हमें छू सकता लेकिन वह नहीं माना और परमात्मा ने उसे वरदान दे दिया और वह सुबह गुलाब का फूल हो गया और सुबह से ही मुसीबतें शुरु हो गयी जोर की आंधियां चलीं, प्राण का रोआं-रोआं उसका कांप गया, जड़े उखड़ने लगीं नीचे दबे हुए उसके जाति के फूल कहने लगे, देखा पागल को, अब मुसीबत पड़ा दोपहर होते-होते सूरज तेज हुआ फूल तो खिले थे, लेकिन कुम्हलाने लगे बरसा आई, पंखुड़िया नीचे गिरने लगीं फिर तो इतने जोर की बरसा आई कि सांझ होते-होते जड़े उखड़ गई और वह वृक्ष, वह फूलों का, गुलाब के फूलों का पौधा जमीन पर गिर पड़ा जब वह जमीन पर गिर पड़ा, तब वह अपने फूलों के करीब आ गया उन फूलों ने उस से कहा, पागल, हमने पहले ही कहा था व्यर्थ अपनी जिंदगी गंवाई मुश्किलें ले ली नई अपनी हाथ से हमारी पुरानी सुविधा थी, माना कि पुरानी मुश्किलें थीं, लेकिन सब आदी था, परिचित था, साथ-साथ जीते थे, सब ठीक थे *उस मरते हुए गुलाब के फूल ने कहा, ना समझो, मैं तुमसे भी यही कहूंगा कि जिंदगी भर ईंट की आड़ में छिपे हुए घास का फूल होने से चौबीस घंटे के लिए फूल हो जाना बहुत आनंदपूर्ण है!* मैंने अपनी आत्मा पा ली, मैं तूफानों से लड़ लिया, मैंने सूरज से मुलाकात ले ली, मैं हवाओं से जूझ लिया, मैं ऐसे ही नहीं मर रहा हूं, मैं जी कर मर रहा हूं तुम मरे हुए जी रहे हो *निश्चित ही जिंदगी को अगर हमें जिंदा बनाना है, तो बहुत सी जिंदा समस्याएं खड़ी हो जाएंगी लेकिन होनी चाहिए और अगर हमें जिंदगी को मुर्दा बनाना है, तो हो सकता है हम सारी समस्याओं को खत्म कर दें, लेकिन तब आदमी मरा-मरा जीता हैं!* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸
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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬● *बहुत शानदार बात लिखी* गाँव में *नीम* के पेड़ कम हो रहे है घरों में *कड़वाहट* बढती जा रही है ! जुबान में *मीठास* कम हो रही है, शरीर मे *शुगर* बढती जा रही है ! किसी महा पुरुष ने सच ही कहा था की जब *किताबे* सड़क किनारे रख कर बिकेगी और *जूते* काँच के शोरूम में तब समझ जाना के लोगों को ज्ञान की नहीं जूते की जरुरत है। ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬●
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🕸 *सबसे सुंदर स्तिथि वह होती है जब हम किसी के दुःख ने दुःखी और किसी के सुख में सुखी होते है।*🕸 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 *अगर हमारी खुशी किसी के दुःख पर खड़ी है तो यह बहुत* *अफसोसजनक स्थिति है*. *अक्सर लोग अपनी सफलता से उतने खुश नहीं होते जितने वो* *दूसरे की असफलता से होते हैं, और यह नकारात्मक ढंग किसी को भी खुशी की असली* *जमीन को ही छीन लेता है.!* *लोग एक दूसरे के प्रति संदेह, इर्ष्या और प्रतिस्पर्धा से भरे हुए जी रहे होते हैं, जबकि बातें सब प्रेम, सहयोग और समरसता की कर रहे होते हैं. बातें जब बस जबान पर ही रह रह जाएँ और दिल में न उतरें तो ऐसी बातों को छोड़कर अपने दिल के तहखाने में जमा सामान को गौर से देखना ही बेहतर होता है. कम से कम ऐसे में इंसान ईमानदारी से अपने दिल में पलते साँप, बिच्छू और जंगली पशुओं को देखकर उनसे आज़ाद होने कोशिश भी कर सकता है!!* *और वह सबसे अच्छी स्थिति होगी जब हम एक दूसरे के दुःख में दुखी और प्रसन्नता में प्रसन्न हो सकें!!*
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*भीतर के "मैं" का मिटना ज़रूरी है!* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 सुकरात समुन्द्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी। वो उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा, तुम क्यों रो रहे हो? लड़के ने कहा यह जो मेरे हाथ में प्याला है मैं उसमें इस समुन्द्र को भरना चाहता हूँ पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं। बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं भी रोने लगे। अब पूछने की बारी बच्चे की थी। बच्चा कहने लगा- आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका प्याला कहाँ है? सुकरात ने जवाब दिया बालक, तुम छोटे से प्याले में समुन्द्र भरना चाहते हो, और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ। आज तुमने सिखा दिया कि समुन्द्र प्याले में नहीं समा सकता है, मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा यह सुनके बच्चे ने प्याले को दूर समुन्द्र में फेंक दिया और बोला "सागर अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो मेरा प्याला तो तुम्हारे में समा सकता है। इतना सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले- बहुत कीमती सूत्र हाथ में लगा है। हे परमात्मा! आप तो सारा का सारा मुझ में नहीं समा सकते हैं पर मैं तो सारा का सारा आपमें लीन हो सकता हूँ। ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था तो भगवान उस बालक में समा गए। सुकरात का सारा अभिमान ध्वस्त कराया। जिस सुकरात से मिलने को सम्राट समय लेते थे वह सुकरात एक बच्चे के चरणों में लोट गए थे। ईश्वर जब आपको अपनी शरण में लेते हैं तब आपके अंदर का "मैं" सबसे पहले मिटता है। या यूँ कहें *जब आपके अंदर का "मैं" मिटता है तभी ईश्वर की कृपा होती है।* 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸
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🍃 *नरक तुम्हारे भय में है!* *स्वर्ग तो निर्भयता में है!!*🍃 🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸🕸 *क्या-क्या डर ! कैसे-कैसे डर ! हर चीज में भयभीत कर रखा है तुम्हें......* *यह पंडित - पुरोहितों का जाल है , इसका परमात्मा से कोई संबंध नहीं है । पंडित - पुरोहित जीते हैं तुम्हारे भय पर , तुम्हारे भय के शोषण पर । वे तुम्हें खूब भयभीत किए हुए हैं । वे तुम्हें ठहरने नहीं देते , कंपाए रखते हैं । तुम जितने भयभीत रहो , उतना ही उनका बल तुम्हारे ऊपर रहता है । भयभीत रहोगे तो तुम कभी अपनी मुक्ति की घोषणा न कर सकोगे , भयभीत रहोगे तो हिंदू रहोगे , मुसलमान रहोगे , ईसाई रहोगे , जैन रहोगे ! निर्भय हुए कि फिर क्यों......फिर क्यों इन छोटी - छोटी सीमाओं में और दायरों में अपने को बंद करोगे ? फिर क्यों इन डबरों में अपने को बंद करोगे ? निर्भय हुए तो तुम छोड़ दोगे यह फिक्र , ये पागलपन की बातें कि कहीं कोई नरक है , जहां लोग कड़ाहों में पकौड़ों की तरह जलाए जा रहे हैं , चुड़ाए जा रहे हैं । और कहीं कोई स्वर्ग है , जहां हूरें ऋषि -मुनियों की सेवा कर रही हैं । फरिश्ते , अप्सराएं बैंड -बाजा बजा कर स्वागत कर रहे हैं । और जहां शराब के चश्मे बह रहे हैं । और जहां कल्पवृक्ष हैं कि ऋषि - मुनि उनके नीचे बैठे हैं और जो भी इच्छा करते हैं , तत्क्षण पूरी हो जाती है...* *न कहीं कोई नरक है , न कहीं कोई स्वर्ग है । नरक है तुम्हारे भय में और स्वर्ग है तुम्हारे निर्भय होने में । और निर्भयता का पाठ कहां सीखोगे -- यही जीवन पाठशाला है.....!!*
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*जिसकी जैसी भावना* एक बार भगवान बुद्ध कहीं प्रवचन दे रहे थे। अपने प्रवचन ख़त्म करते हुए उन्होंने आखिर में कहा, जागो, समय हाथ से निकला जा रहा है। सभा विसर्जित होने के बाद उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा, चलो थोड़ी दूर घूम कर आते हैं। आनंद बुद्ध के साथ चल दिए।अभी वे विहार के मुख्य दरवाजे तक ही पहुंचे थे कि एक किनारे रुक कर खड़े हो गए।प्रवचन सुनने आए लोग एक- एक कर बाहर निकल रहे थे। इसलिए भीड़ सी हो गई थी| अचानक उसमे से निकल कर एक स्त्री गौतम बुद्ध से मिलने आई।। उसने कहा तथागत मै नर्तकी हूं| आज नगर सेठ के घर मेरे नृत्य का कार्यक्रम पहले से तय था, लेकिन मै उसके बारे में भूल चुकी थी। आपने कहा, समय निकला जा रहा है तो मुझे तुरंत इस बात की याद आई। उसके बाद एक डकैत बुद्ध की ओर आया। उसने कहा, तथागत मै आपसे कोई बात छिपाऊंगा नहीं। मै भूल गया था कि आज मुझे एक जगह डाका डालने जाना था कि आज उपदेश सुनते ही मुझे अपनी योजना याद आ गई। बहुत बहुत धन्यवाद!...उसके जाने के बाद धीरे धीरे चलता हुआ एक बूढ़ा व्यक्ति बुद्ध के पास आया। वृद्ध ने कहा, जिन्दगी भर दुनियादारी की चीजों के पीछे भागता रहा। अब मौत का सामना करने का दिन नजदीक आता जा रहा है, तब मुझे लगता है कि सारी जिन्दगी यूंही बेकार हो गई। आपकी बातों से आज मेरी आंखें खुल गईं। आज से मै अपने सारे दुनियारी मोह छोड़कर निर्वाण के लिए कोशिश करना चाहता हूं। जब सब लोग चले गए तो बुद्ध ने कहा, देखो आनंद! प्रवचन मैंने एक ही दिया, लेकिन उसका हार किसी ने अलग अलग मतलब निकाला। जिसकी जितनी झोली होती है, उतना ही दान वह समेत पाता है। निर्वाण प्राप्ति के लिए भी मन की झोली को उसके लायक होना होता है। इसके लिए मन का शुद्ध होना बहुत जरूरी है। 🕊🕊🕊🕊🕊🕊🕊🕊🕊🕊
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. *जिन्दगी जब देती है,* *तो एहसान नहीं करती* *और जब लेती है तो,* *लिहाज नहीं करती* *दुनिया में दो ‘पौधे’ ऐसे हैं* *जो कभी मुरझाते नहीं* *और* *अगर जो मुरझा गए तो* *उसका कोई इलाज नहीं।* *पहला –* *‘नि:स्वार्थ प्रेम’* *और* *दूसरा –* *‘अटूट विश्वास’* 🌹 *Good Morning* 🌹
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🕸 *समस्याओं में हमने ही प्राण डाले है!उन्हें लगातार महत्व देने से अब वही समस्याएं जीवंत प्रतीत होने लगी है।* 🕸 एक फकीर बैठा हुआ था नदी के किनारे अपने शिष्यों के साथ। सर्दी थी बहुत और फकीर ठिठुर रहा था। देखा नदी में एक कंबल बहता चला आ रहा है। तो शिष्यों ने कहा, अरे, कंबल! आप छलांग लगाकर कंबल निकाल क्यों नहीं लाते? आप ठंड़ से परेशान हैं। वह फकीर छलांग लगाया। लेकिन वह कंबल नहीं था, वह एक रीछ था, जो सिर छिपाए हुए पानी में बहा जा रहा था। कंबल जैसा मालूम पड़ रहा था। अब जब उसने रीछ को पकड़ लिया, तो उसने पाया कि उसने तो पकड़ा नहीं था कि तत्काल रीछ ने उसको पकड़ा। अब वह उसके साथ बहने लगा। उसके शिष्यों ने कहा, क्या मामला है? अगर कंबल बहुत वजनी हो और खींचकर न ला सकते हो, तो छोड़ दो। उसने कहा कि अब छोड़ना बहुत मुश्किल है, कंबल ने भी पकड़ लिया है। मैं नहीं पकड़े हूं, मैं तो छोड़ने की कोशिश कर रहा हूं, लेकिन अब कंबल ने भी पकड़ लिया है। तुमने जो उलझनें पकड़ी हैं, वे मुर्दा नहीं हैं। उन्हें तुमने खूब जीवन दिया है, खूब सींचा है। वे कंबल की तरह नहीं हैं, वे रीछ की तरह हो गयी हैं। उनमें तुमने प्राण ड़ाल दिया, अपना ही प्राण ड़ाला है। खींच लोगे धीरे— धीरे तो निकल जाएगा, निष्प्राण हो जाएंगी। लेकिन एकदम से होगा नहीं। समय लगेगा। और इसलिए जिसमें हिम्मत हो संघर्ष को जारी रखने की, वही उलझनों से मुक्त हो सकता है। तमाम समस्याओं को हमने खुद ही महत्व देकर उन्हें बड़ा किया है। 🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱🌱
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*गुरु ही मीत है* *गुरु ही प्रीत है* *गुरु ही जीवन है* *गुरु ही प्रकाश है* *गुरु ही सांस है* *गुरु ही आस है* *गुरु ही प्यास हैै* *गुरु ही ज्ञान है* *गुरु ही ससांर है* *गुरु ही प्यार है* *गुरु ही गीत है* *गुरु ही संगीत है* *गुरु ही लहर है* *गुरु ही भीतर है* *गुरु ही बाहर है* *गुरु ही बहार है* *गुरु ही प्राण है* *गुरु ही जान है* *गुरु ही संबल है* *गुरु ही आलंबन है* *गुरु ही दर्पण है* *गुरु ही धर्म है* *गुरु ही कर्म है* *गुरु ही मर्म है* *गुरु ही नर्म है* *गुरु ही प्राण है* *गुरु ही जहान है* *गुरु ही समाधान है* *गुरु ही आराधना है* *गुरु ही उपासना है* *गुरु ही सगुन है* *गुरु ही निर्गुण है* *गुरु ही आदि है* *गुरु ही अन्त हैै* *गुरु ही अनन्त है* *गुरु ही विलय है* *गुरु ही प्रलय है* *गुरु ही आधि है* *गुरु ही व्याधि है* *गुरु ही समाधि है* *गुरु ही जप है* *गुरु ही तप है* *गुरु ही ताप है* *गुरु ही यज्ञः है* *गुरु ही हवन है* *गुरु ही समिध है* *गुरु ही समिधा है* *गुरु ही आरती है* *गुरु ही भजन है* *गुरु ही भोजन है* *गुरु ही साज है* *गुरु ही वाद्य है* *गुरु ही वन्दना है* *गुरु ही आलाप है* *गुरु ही प्यारा है* *गुरु ही न्यारा है* *गुरु ही दुलारा हैै* *गुरु ही मनन है* *गुरु ही चिंतन है* *गुरु ही वंदन है* *गुरु ही चन्दन है* *गुरु ही अभिनन्दन है* *गुरु ही नंदन है* *गुरु ही गरिमा है* *गुरु ही महिमा है* *गुरु ही चेतना है* *गुरु ही भावना है* *गुरु ही गहना है* *गुरु ही पाहुना है* *गुरु ही अमृत है* *गुरु ही खुशबू है* *गुरु ही मंजिल है* *गुरु ही सकल जहाँ है* *गुरु समष्टि है* *गुरु ही व्यष्टि है* *गुरु ही सृष्टी है* *गुरु ही सपना है* *गुरु ही अपना है* "पानी" के बिना "नदी" बेकार है, "अतिथि" के बिना "आँगन" बेकार है, "प्रेम" ना हौ तो "सगेसम्बन्धी"बेकार है, *और* जीवन में "गुरु" ना हौ तो "जीवन" बेकार है। Happy Guru Purnima
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प्रकृति का तिसरा नियम आपको जीवन से जो कुछ भी मिलें उसे पचाना सीखो क्योंकि भोजन न पचने पर रोग बढते है। पैसा न पचने पर दिखावा बढता है बात न पचने पर चुगली बढती है । प्रशंसा न पचने पर अंहकार बढता है। निंदा न पचने पर दुश्मनी बढती है । राज न पचने पर खतरा बढता है । दुःख न पचने पर निराशा बढती है । और सुख न पचने पर पाप बढता है । बात कडुवी बहुत है पर सत्य है
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🌸🔆🌸🔆🌸🔆🌸🔆🌸🔆 "कर्म" एक ऐसा रेस्टोरेंट है , जहाँ ऑर्डर देने की जरुरत नहीं है हमें वही मिलता है जो हमने पकाया है। जिंदगी की बैंक में जब " प्यार " का " बैलेंस " कम हो जाता है तब " हंसी-खुशी " के चेक बाउंस होने लगते हैं। इसलिए हमेशा अपनों के साथ नज़दीकियां बनाए रखिए । 🌸🔆🌸 🌸🔆🌸🔆🌸🔆🌸 🌻🌻 सुप्रभात 🌻🌻 🌷 *आज का दिन मंगलमय हो*🌷 🍃🍂🍃 🍃🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 ✍🏻 *"रोने से तो आंसू भी पराये हो जाते हैं,* *"लेकिन मुस्कुराने से...* *पराये भी अपने हो जाते हैं !* *"मुझे वो रिश्ते पसंद है,* *"जिनमें " मैं " नहीं " हम " हो !!* *"इंसानियत दिल में होती है, हैसियत में नही,* *"उपरवाला कर्म देखता है, वसीयत नही..!!*✍ 🍁🌻 🍀🌺 💎💎💎💎💎💎💎💎💎💎💎 *घमंड* और *पेट* जब ये दोनों बढतें हैं.. तब *इन्सान* चाह कर भी किसी को गले नहीं लगा सकता.. जिस प्रकार नींबू के रस की एक बूँद हज़ारों लीटर दूध को बर्बाद कर देती है... ...उसी प्रकार... *मनुष्य* *का* *अहंकार* भी अच्छे से अच्छे संबंधों को बर्बाद कर देता है".!!! •●‼ *शुभ प्रभात * ‼●• 🌿🌺💐🌺🌿 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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*सरकार ने ...* *आधार कार्ड को पैन से जोड़ दिया,* *आधार कार्ड को बैंक खाते से जोड़ दिया,* *आधार कार्ड को रसोई गैस से जोड़ दिया,* *आधार कार्ड को सामाजिक फायदे की सभी स्कीम से जोड़ दिया,* *लेकिन आश्चर्य की बात है कि* *आधार कार्ड को वोटरआई डी कार्ड* *(EPIC) से क्यों नहीं जोड़ा?* *आधार कार्ड को EVM मशीन से क्यों नहीं जोड़ा ?* *अगर आधार कार्ड को वोटिंग मशीन से जोड़ दिया गया तो सभी सिर्फ FINGER PRINT MATCH होने से ही मतदान कर सकेंगे जिससे नकली मतदान पर अंकुश लगेगा ।* *इससे कुछ राजनीतिक दलों की पोल भी खुल जाएगी* *क्योंकि* *1.. इससे उनके मरे हुए मतदाता मतदान नहीं कर सकते* *2.. जाली मतदान नहीं कर सकते* *3.. एक नाम के एकाधिक पहचान पत्र काम नहीं आएँगे* *4.. गैर कानूनी विदेशी घुसपैठियों द्वारा मतदान नहीं होगा* *5.. माओवादी जिनके पास आधार कार्ड नहीं है वो मतदान नहीं कर सकते* *6.. काश्मीरी अल्गाववादी जो भारत के नागरिक नहीं बनना चाहते वो मतदान नहीं कर सकते* *इस प्रकार के बहुत सारे फायदे हैं अगर आधार कार्ड को EPIC से जोड़ दिया जाए ।* *स्वच्छ भारत की सही जरूरत है कि मतदान के तरीके को पहले स्वच्छ किया जाए ।* *परंतु सबसे बड़ा सवाल ...* *क्या हम ऐसा होता देख पाएँगे ?* *क्या हमारी सरकार ऐसा करेगी ?* *अगर मेरी बात से सहमत हैं तो अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की चेष्टा करें।* कॉपी
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जानिए चोटी रखने का महत्व 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ 🌻चोटी (शिखा)🌻 👇👇👇👇👇👇 _वैदिक धर्म में सिर पर शिखा(चोटी) धारण करने का असाधारण महत्व है।प्रत्येक बालक के जन्म के बाद मुण्डन संस्कार के पश्चात सिर के उस विषेश भाग पर गौ के नवजात बच्चे के खुर के प्रमाण आकार की चोटी रखने का विधान है।_ _यह वही स्थान होता है जहाँ सुषुम्ना नाड़ी पीठ के मध्य भाग में से होती हुई ऊपर की और आकर समाप्त होती है और उसमें से सिर के विभिन्न अंगों के वात संस्थान का संचालन करने को अनेक सूक्ष्म वात नाड़ियों का प्रारम्भ होता है।_ _सुषुम्ना नाड़ी सम्पूर्ण शरीर के वात संस्थान का संचालन करती है।_ _यदि इसमें से निकलने वाली कोई नाड़ी किसी भी कारण से सुस्त पड़ जाती है तो उस अंग को फालिज मारना कहते हैं।समस्त शरीर को शक्ति केवल सुषुम्ना नाड़ी से ही मिलती है।_ _सिर के जिस भाग पर चोटी रखी जाती है उसी स्थान पर अस्थि के नीचे लघुमस्तिष्क का स्थान होता है जो गौ के नवजात बच्चों के खुर के ही आकार का होता है और शिखा भी उतनी ही बड़ी उसके ऊपर रखी जाती है।_ _बाल गर्मी पैदा करते हैं।बालों में विद्युत का संग्रह रहता है जो सुषुम्ना नाड़ी को उतनी ऊष्मा हर समय प्रदान करते रहते हैं जितनी की उसे समस्त शरीर के वात-नाड़ी संस्थान को जागृत व उत्तेजित करने के लिए आवश्यकता होती है।_ _इससे मानव का वात नाड़ी संस्थान आवश्यकतानुसार जागृत रहते हुए समस्त शरीर को बल देता है।किसी भी अंग में फालिज पड़ने का भय नहीं रहता है और साथ ही लघुमस्तिष्क विकसित होता रहता है,जिसमें जन्म जन्मान्तरों के एवं वर्तमान जन्म के संस्कार संग्रहीत रहते हैं।_ _सुषुम्ना का जो भाग लघुमस्तिष्क को संचालित करता है,वह उसे शिखा द्वारा प्राप्त ऊष्मा से चैतन्य बनाता है,इससे स्मरण शक्ति भी विकसित होती है।_ _वेद में शिखा रखने का विधान कई स्थानों पर मिलता है,देखिये--_ शिखिभ्यः स्वाहा (अथर्ववेद १९-२२-१५) _अर्थ-चोटी धारण करने वालों का कल्याण हो।_ यशसेश्रियै शिखा।-(यजु० १९-९२) _अर्थ-यश और लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए सिर पर शिखा धारण करें।_ याज्ञिकैंगौर्दांणि मार्जनि गोक्षुर्वच्च शिखा।-(यजुर्वेदीय कठशाखा) _अर्थात् सिर पर यज्ञाधिकार प्राप्त को गौ के खुर के बराबर(गाय के जन्में बछड़े के खुर के बराबर) स्थान में चोटु रखनी चाहिये।_ केशानां शेष करणं शिखास्थापनं। केश शेष करणम् इति मंगल हेतोः ।। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 ✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻 *न "माँग" कुछ "जमाने" से* *" ये" देकर "फिर" "सुनाते" हैं* *"किया" "एहसान" "जो" एक "बार"* *वो "लाख" बार "जताते" "हैं"* *"है" "जिनके" पास "कुछ" "दौलत"* *" समझते" हैं "खुदा" हैं "हम"* *"तू "माँग" "अपने" प्रभु " से* *"जहाँ" माँगने "वो" भी "जाते" है..* 🌻🌻🌻 *सुप्रभात* 🌻🌻🌻
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🌺🌻🙏जय श्री मदन जी🙏 🙏🌻🌺 *सारे जगत को देने वाले* *मैं क्या तुझको भेंट चढ़ाऊँ,* *जिसके नाम से आए खुशबू* *मै क्या उसको फूल चढ़ाऊँ !!.* *वो तैरते तैरते डूब गये, जिन्हे खुद पर गुमान था।।* *और वो डूबते डूबते भी तर गये.. जिन पर तू मेहरबान था।।* 🌹 जय श्री मदन जी 🌹
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*"न नग्न रहने से , न सिर मुंडवाने से , न जटाएं रखने से , न भभूत लगाने से ,न पूजापाठ से, न नदियो मे स्नान करने से और न ईश्वर या किसी देवी देवता का नाम रटने से और न ही कोई कर्मकांड से कोई मनुष्य पवित्र नहीँ हो जाता......!* *जिसमे सत्य है , सदाचार है ,शीलवान है,वही मनुष्य पवित्र है.......!* *"न जाति से, न वंश से , न जन्म, से कोई मनुष्य अपवित्र नही हो जाता !* *जिसमें सत्य नही ,सदाचार नहीं शीलवान नहीं ,वही मनुष्य अपवित्र है !"* *महात्मा बुध्द*
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