Skip to main content
*आदमी की खोज उस घर की खोज है जो सच में घर हो , सराय न हो । यहां तो सब सरायें हैं , धर्मशालाएं हैं-- बस रैनबसेरा है । सुबह हुई , चल पड़ना होगा । बहुत मोह मत लगा लेना । यह छूट ही जाना है । तुमसे पहले बहुत लोग यहां ठहरे और गए ; तुम भी उसी कतार में हो । इसलिए चाहे यहां कितना ही धन हो , कितना ही पद हो , प्रतिष्ठा हो ; फिर भी तृप्ति नहीं मिलती । तृप्ति यहां मिलती ही नहीं । तृप्ति का संसार से कोई संबंध ही नहीं है । अक्सर ऐसा होता है कि गरीब को तो थोड़ी आशा भी रहती है , अमीर की आशा भी टूट जाती है । गरीब को तो लगता है कि एक मकान होगा अपना , तो शांति होगी । थोड़ा धन-संपत्ति होगी ; सुविधा होगी ; फिर सुख और चैन से रहेंगे । उसे यह पता ही नहीं है कि सुख-चैन यहां हो नहीं सकता । धर्मशाला में कैसा सुख-चैन ? कब उठा लिए जाओगे...! आधी रात में पुकार लिए जाओगे ..! कब मौत का दूत द्वार पर खड़ा हो जाएगा और दस्तक देने लगेगा--कुछ भी तो नहीं कहा जा सकता ...! यहां चैन कैसे हो सकता है ? बेचैनी यहां स्वाभाविक है....!!
Popular posts from this blog
Comments
Post a Comment