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*हम जीवित हैं , लेकिन हमें पता नहीं कि जीवन क्या है । इस अज्ञान के कारण ही हमें ज्ञात होता है कि मृत्यु भी घटती है । मृत्यु एक अज्ञान है । जीवन का अज्ञान ही मृत्यु की घटना बन जाती है । काश ! उस समय जीवन से परिचित हो सकें जो भीतर है , तो उसके परिचय की एक किरण भी सदा - सदा के लिए इस अज्ञान को तोड़ देती है कि मैं मर सकता हूं, या कभी मरा हूं , या कभी मर जाऊंगा । लेकिन उस प्रकाश को हम जानते नहीं है जो हम हैं , और उस अंधकार से हम भयभीत होते हैं जो हम नहीं है । उस प्रकाश से परिचित नहीं हो पाते जो हमारा प्राण है , जो हमारा जीवन है जो हमारी सत्ता है ; और उस अंधकार से हम भयभीत होते हैं , जो हम नहीं हैं....!मनुष्य मृत्यु नहीं है , मनुष्य अमृत है । लेकिन हम अमृत की ओर आंख नहीं उठाते है । हम जीवन की तरफ , जीवन की दिशा में कोई खोज ही नहीं करते हैं , एक कदम भी नहीं उठाते हैं । जीवन से रह जाते हैं अपरिचित और इसलिए मृत्यु से भयभीत प्रतीत होते हैं । इसीलिए प्रश्न जीवन और मृत्यु का नहीं है , प्रश्न है सिर्फ जीवन का....!!
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