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एक ही प्रार्थना है। एक ही निमंत्रण है। एक ही अभीप्सा है भक्त की कि यह मेरे छोटे से हृदय में, यह बूंद जैसे हृदय में तू अपने सागर को आ जाने दे। बूंद में सागर उतर सकता है। बूंद ऊपर से ही छोटी दिखाई पड़ती है। बूंद के भीतर उतना ही आकाश है, जितना बूंद के बाहर आकाश है। देर है अगर कुछ तो हार्दिक निमंत्रण की देर है। बाधा है अगर कुछ तो बस इतनी ही कि तुमने पुकारा नहीं।
परमात्मा तो आने को प्रतिपल आतुर है, पर बिन बुलाए आए भी तो कैसे आए? और बिन बुलाए आए तो तुम पहचानोगे भी हनीं। बिन बुलाए आए तो तुम दुतकार दोगे। तुम बुलाओगे प्राणपण से। रोआं-रोआं तुम्हारा प्रार्थना बनेगा, धड़कन-धड़कन तुम्हारी प्यास बनेगी। तुम प्रज्वलित हो उठोगे। एक ही अभीप्सा रह जाएगी। तुम्हारे भीतर उसे पाने की। उसी क्षण क्रांति घट जाती है। उसी क्षण उसका आगमन हो जाता है। वह तो आया ही हुआ था, बस तुम मौजूद नहीं थे। वह तो सामने ही खड़ा था, पर तुमने आंखें बंद कर रखी थीं। परमात्मा दूर नहीं है, तुम उससे बच रहे हो। परमात्मा दूर नहीं है, तुम सदा उसकी तरफ पीठ कर रहे हो।
और कारण है। तुम्हारा बचना भी अकारण नहीं है। बूंद डरती है कि अगर सागर उतर आया, तो मेरी बिसात क्या! मैं गई! अगर सागर आया तो मैं मिटी।
वही भय है कि कहीं मैं मिट न जाऊं। वही भय है कि कहीं मैं समाप्त न हो जाऊं! कहीं मेरी परिभाषा ही अंत पर न आ जाए! मेरा अस्तित्व ही संकट में न पड़ जाए!
इससे तुम पुकारते नहीं प्राणपण से। तुम प्रार्थना भी करते हो तो थोथी। तुम प्रार्थना भी करते हो तो झूठी। तुम प्रार्थना भी करते हो तो औपचारिक। और प्रार्थना कहीं औपचारिक हो सकती है? प्रेम कहीं उपचार हो सकता है? तुम्हारी औपचारिकता ही तुम्हारी उपाधि बन गई है, तुम्हारी बीमारी बन गई। कब तुम सहज होकर पुकारोगे? कब तुम समग्र होकर पुकारोगे? और बार-बार नहीं पुकारना पड़ता है। एक पुकार भी काफी है। लेकिन तुम पूरे के पूरे उस पुकार में सम्मिलित होने चाहिए। जरा सा भी अंश तुम्हारा पुकार के बाहर रह गया, तो पुकार काम न आएगी।
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