Skip to main content
*टाल रहे हो बिना इस बात को समझे कि इस देह का कोई भरोसा नहीं है । यह एक क्षण भी टिकेगी या नहीं ? कल सुबह होगी या नहीं ? जो समझते हैं वे हर रात परमात्मा को धन्यवाद देकर सोते हैं कि आज का दिन तूने दिया , धन्यवाद ! अब कल सुबह उठूं या न उठूं , इसलिए आखिरी नमस्कार । जब सुबह उठते हैं तो जो समझदार हैं वे फिर परमात्मा को धन्यवाद देते हैं कि चमत्कार ! कि मैं तो सोचता था कि आखिरी नमस्कार हो गया , फिर आज उठ आया हूं , फिर तूने सूरज दिखाया , फिर पक्षियों के गीत सुनाई पड़ रहे हैं , धन्यवाद ! इस आखिरी दिन के लिए फिर धन्यवाद ! सुबह भी आखिरी दिन है , सांझ भी आखिरी दिन है , ऐसा ही समझदार आदमी जीता है : यही उसकी बंदगी है । मूढ़ की तो न आखिरी रात होती है न आखिरी दिन होता है ; वह तो मरते-मरते तक योजनाएं बनाता रहता है , आखिरी क्षण तक मरते-मरते हिसाब लगाता रहता है । मौत द्वार पर आ जाती है , फिर भी उसे दिखाई नहीं पड़ती । ऐसा हमारा अंधापन है.......!!
Popular posts from this blog
Comments
Post a Comment