क्या कभी तुम भीगए हो उस गली में?जहाँ चाँद को छुकरमीरा दीवानी हुई..जहाँ कदम से कदम मिलाकरसंग चलते है तारेजहाँ सूरज समेट लेता हैचाँदनी को अपनी बाहों मेंऔर किरण संग मुस्कुरा करनिकलती है जिंदगी..क्या गए हो तुम वहाँ..जहाँ है गोपियों का स्थल वहाँ की हवाओ में स्वर है..जो पी ले वहाँ का पानीहो जाता है मगन प्रेम मेंजहाँ दिल की ज़मीन परभीगी-भीगी सी चाहत उगती हैलहराता है उसका ही चेहराहर मुस्कुराते हुए फूलों मेंजहा जुगनुओं की बस्ती मेंआज भी वो मुस्कुराता है..जिसने कहा था..तुम जब भी मुझे पुकारोगेमैं जरुर आऊँगा..जहाँ बादलों पर पड़ी,सिलवटों को देख..उसके होने का सबूत मिलता हैक्या कभी गए हो तुम,उस गली में..जिसके चारों और..मैं तुम्हें देखता हूँ..तुम्हारे हर शब्दों के जादू से..बिखर जाता हूँजब भी मेरी ज़मी परतुम्हारे नाम का चाँद उगता हैक्या गए हो तुम भी कभी वहाँ?जहाँ रुह अपनी देह बदलकर,नया जीवन रचती है..

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