*छत पे सोये बरसों बीते* *तारों से मुलाक़ात किये* *और चाँद से किये गुफ़्तगू* *सबा से कोई बात किये।* *न कोई सप्तऋिषी की बातें* *न कोई ध्रुव तारे की* *न ही श्रवण की काँवर और* *न चन्दा के उजियारे की।* *देखी न आकाश गंगा ही* *न वो चलते तारे* *न वो आपस की बातें* *न हँसते खेलते सारे।* *न कोई टूटा तारा देखा* *न कोई मन्नत माँगी* *न कोई देखी उड़न तश्तरी* *न कोई जन्नत माँगी।* *अब न बारिश आने से भी* *बिस्तर सिमटा कोई* *न ही बादल की गर्जन से* *माँ से लिपटा कोई।* *अब न गर्मी से बचने को* *बिस्तर कभी भिगोया है* *हल्की बारिश में न कोई* *चादर तान के सोया है।* *अब तो तपती जून में भी न* *पुर की हवा चलाई है* *न ही दादी माँ ने कथा* *कहानी कोई सुनाई है।* *अब न सुबह परिन्दों ने* *गा गा कर हमें जगाया है* *न ही कोयल ने पंचम में* *अपना राग सुनाया है।* *बिजली की इस चकाचौंध ने* *सबका मन भरमाया है* *बन्द कमरों में सोकर सबने* *अपना काम चलाया है।* *तरस रही है रात बेचारी* *आँचल में सौग़ात लिये* *कभी अकेले आओ छत पे* *पहले से जज़्बात लिये!!!* 🌹😌🌹😌🌹😌🌹🤷‍♀

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