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तुम्हारी सारी प्राथनाएं तुम्हारी शिकायतें हैं |
और प्राथना कहीं शिकायत हो सकती है ?
तुम उसी दिन मंदिर पहुंच पाओगे जिस दिन तुम धन्यवाद देने जाओगे, जिस दिन तुम कहने जाओगे कि मैं किसी योग्य न था, मेरी कोई क्षमता और पात्रता न थी, और तुमने इतना दिया !
जिस दिन तुम्हारे पास जो है, तुम्हारी पात्रता से तुम्हें ज्यादा दिखाई पड़ेगा, उसी दिन प्राथना का जन्म होगा |फिर उस प्राथना का कोई अंत नहीं है | वह बढ़ती जाती है, बढ़ती जाती है | और एक घड़ी ऐसी आती है कि तुम्हारी पात्रता शून्य हो जाती है | उस शून्य पात्र में ही सारा अस्तित्व उतर आता है | जिस दिन तुम कह पाते हो, मेरी कोई भी योग्यता नहीं, मैं जीवन के योग्य भी न था, एक सांस भी ले सकूं अस्तित्व की, इसकी भी मेरी कोई क्षमता न थी, और तूने मुझे अनंत जीवन दिया, जिस दिन तुम्हें इसमें परमात्मा के अनुग्रह के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई न पड़ेगा, तुम बिल्कुल शून्य मात्र हो जाओगे, उसी क्षण फिर तुम्हारी कोई मृत्यु नहीं है |
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