आत्मा की नित्यता का बोध चित्त से अर्थात् विचारों के समूह से मुक्त करता है। परमात्मा की नित्यता का बोध चिंता से मुक्त करता है। आत्मा और परमात्मा का सुमिरन चित्त और चिंता दोनों से मुक्त करता है।

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