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Showing posts from September, 2018
67 साल में बने 65 एयरपोर्ट, हमने चार साल में 35 बनाए : PM कोई लिस्ट देगा भाई इन एयरपोर्ट्स की ,मुझे तो गूगल पर भी नहीं मिल रहे !!🤔
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*"अनुभव कहता है* *खामोशियाँ ही बेहतर हैं,* *शब्दों से लोग रूठते बहुत हैं..."* *जिंदगी गुजर गयी....* *सबको खुश करने में ..* *जो खुश हुए वो अपने नहीं थे,* *जो अपने थे वो कभी खुश नहीं* *हुए...* *कितना भी समेट लो..* *हाथों से फिसलता ज़रूर है..* *ये वक्त है साहब..* *बदलता ज़रूर है..*
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ईश्वर के हर फैसले पर खुश रहो क्योंकि ईश्वर आपको वो नहीं देते जो आप चाहते हो बल्कि ईश्वर आपको वो देते है जो आपके लिए अच्छा है
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जहां इंसान की सोच खत्म होती है वहीं सर्वशक्तिमान की सोच शुरू होती है । सभी को जय श्री मदन
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🌹🌻 *।। सुविचार ।।* 🌻🌹 *शब्द भी एक तरह का भोजन है।* *किस समय कौनसा शब्द परोसना है वो आ जाये तो दुनिया मे उससे बढ़िया रसोइया कोई नही है।* *शब्द का भी अपना एक स्वाद है*, *बोलने से पहले स्वयं चख लीजिये।* *अगर खुद को अच्छा नही लगे तो दूसरों को कैसे अच्छा लगेगा।* *आपका दिन मंगलमय हो।* जय श्री मदन जी *🌻🌻 *।। सुप्रभात ।।* 🌻🌻 ♈🗝
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●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬● *बहुत शानदार बात लिखी* गाँव में *नीम* के पेड़ कम हो रहे है घरों में *कड़वाहट* बढती जा रही है ! जुबान में *मीठास* कम हो रही है, शरीर मे *शुगर* बढती जा रही है ! किसी महा पुरुष ने सच ही कहा था की जब *किताबे* सड़क किनारे रख कर बिकेगी और *जूते* काँच के शोरूम में तब समझ जाना के लोगों को ज्ञान की नहीं जूते की जरुरत है। ●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬● 👌🏼Nice line👌🏼 *"कद्र"* करनी है तो *"जीते जी"* करें *"मरने"* के बाद तो *"पराए"* भी रो देते हैं आज *"जिस्म"* मे *"जान"* है तो देखते नही हैं *"लोग"* जब *"रूह"* निकल जाएगी तो *"कफन"* हटा हटा कर देखेंगे *किसी ने क्या खूब लिखा है* *"वक़्त"* निकालकर *"बाते"* कर लिया करो *"अपनों से"* अगर *"अपने ही"* न रहेंगे तो *"वक़्त"* का क्या करोगे *"गुरुर"* किस बात का... *"साहब"* आज *"मिट्टी"* के ऊपर तो कल "मीट्टीकै नीचे.
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*"A Beautiful Dress Can* *Change The* *Personality* *But,* *Beautiful Behaviour Can* *Change The Life...!!!"*. *🌸Good Morning🌸*
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बेरुचि ही सही बैठो तो सही एक समय की बात है, प्रतापगढ़ के राजा की कोई संतान नहीं थी. लेकिन राज्य को आंगे बढ़ाने के लिए एक उतराधिकारी की जरुरत थी. इसलिए राजा ने एक फैसला किया कि वह अपने ही राज्य से किसी एक बच्चे को चुनेगा जो उसका उत्तराधिकारी बनेगा…. इस इरादे से राजा ने अपने राज्य के सभी बच्चों को बुलाकर यह घोषणा की कि वह इन बच्चों में से किसी एक को अपना उत्तराधिकारी चुनेगा… उसके बाद राजा ने उन बच्चो को एक एक थैली बंटवा दी और कहा….. कि आप सब लोगो को जो थैली दी गई है उसमे अलग-अलग फूलों का बीज हैं.. हर बच्चे को सिर्फ एक एक बीज ही दिया गया है… आपको इसे अपने घर ले जाकर एक गमले में लगाना है… और 6 महीने बाद हम फिर इस आप सब के इस गमले के साथ यहीं इकठ्ठा होंगे और उस समय मैं फैसला करूँगा की कौन इस राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा… उन लडकों में एक ध्रुव नाम का लड़का था, बाकी बच्चो की तरह वो भी बीज लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर वापस आ गया… उसी दिन घर जाकर उसने एक गमले में उस बीज को लगा दिया और उसकी अच्छे से देखभाल की… दिन बीतने लगे, लेकिन कई हफ्ते बाद भी ध्रुव के गमले में पौधे का कोई नामोनिशान नही आया…. वहीं आस पास के कुछ बच्चों के गमलों में पौधे दिखने लगे… लेकिन ध्रुव ने सोचा की हो सकता है की उसका बीज अलग हो… यह सोचकर वह पौधे की देखभाल पूरी लगन के साथ करता रहा… लेकिन लगभग तीन महीने बीत जाने के बाद भी उसका गमला खली था…. जबकि दुसरे बच्चों के गमले में फूल भी खिलने लगे थे…. ध्रुव का खाली गमला देखकर सभी उसका मजाक उड़ाने लगे….. पर इसके बावजूद भी ध्रुव ने हार नही मानी और लगातार गमले की देखभाल करता रहा… देखते-देखते 5 महीने बीत गये , अब ध्रुव चिंतित था क्योंकि उसके गमले में कुछ नही निकला था । और अब उस गमले की देखभाल में उसकी रूचि कम हो गयी थी । लेकिन उसकी माँ ने समझाया कि - बेटा नतीजा कुछ भी हो लेकिन तुम्हे इस गमले पर अब भी उतनी ही मेहनत और उतना ही समय देना है जितना तुम पहले देते थे ,फिर भले ही गमले के प्रति तुम्हारी ये मेहनत बेरुखी से भरी हो । क्योंकि ऐसा करने से तुम्हे भी एक तसल्ली होगी कि बे चाह और बेरुचि ही सही लेकिन तूने उस गमले के लिये आखरी तक अपनी ड्यूटी और मेहनत दी। बाकी राजा जाने। और फिर अंत में उसकी माँ ने उसे ये भी समझाया कि सोचो अगर राजा को ये पता चलेगा कि आखरी में तुमने गमले के प्रति मेहनत और समय देना बन्द कर लिया था। तो हो सकता है राज तुमसे गुस्सा करें । और ध्रुव माँ की ये सब बातें सुनकर , तो कभी राजा के डर को याद कर , बेरुखी और बेरुचि ही सही लेकिन पूरा समय और मेहनत देता रहा । और 6 महीने पूरे हो गए उस तय हुए दिन सभी बच्चों को महल में इकठ्ठा किया गया सभी के गमलों में पौधे थे… बस ध्रुव का गमला खाली था… राजा बच्चों के बीच से होकर आंगे बढ़ने लगे … और गमले में लगे सबके पौधों का निरिक्षण करते… सबके पौधे देखते-देखते राजा की नजर ध्रुव के गमले पर पड़ी… राजा ने ध्रुव से पूछा… क्या हुआ तुम्हारा गमला खली क्यों है? ध्रुव ने हिचकिचाहट के साथ जबाव दिया- जी मैंने तो इस गमले पर पूरे 6 महीने तक अपनी तरफ से पूरी मेहनत की और पूरा पूरा समय भी देता रहा लेकिन इसमें से कुछ भी नही निकला…. राजा आंगे बढ़े और सभी के गमले देखने के बाद सभी बच्चों को सम्बोधित करते हुए कहा कि – आप लोगों ने पौधा लाने में बहुत मेहनत की ।ज्यादातर लोग किसी भी कीमत में राजा बनना चाहते हैं लेकिन एक लड़का यहाँ खाली हाथ आया… जिसका नाम है ध्रुव… राजा ने ध्रुव को अपने पास बुलाया । “राजा के इस तरह बुलाने पर ध्रुव को कुछ अजीब लगा..” ध्रुव धीर-धीरे राजा के पास पहुँचता है… जैसे ही राजा ध्रुव के उस खाली गमले को उठाकर सभी बच्चों को दिखता है…. सभी हंसने लगे…. राजा ने ऊँची आवाज में कहा- शांत हो जाओ । 6 महीने पहले मैंने आप सब को जो एक एक बीज दिये थे , वे सब बंजर थे जो कभी उग नही सकते थे…. आप चाहे उसकी कितनी भी देख रेख कर ले उसमे से कुछ भी नही उग सकता था , लेकिन आप सब ने बीज बदल कर आसानी से उगने वाले दूसरे बीज़ ख़रीदे ताकि आप राजा बन सकें। लेकिन आप सब में सिर्फ ध्रुव ही है जो खाली हाँथ आया है । ध्रुव ने मेरे दिये उस बीज़ पर खूब मेहनत की और जब अंत में उसे लगा कि शायद बीज उगने का कोई चारा नही तो भी बेरुखी से ही सही लेकिन उसने पूरे 6 महीनो तक उस गमले में हर रोज अपनी मेहनत और समय दिया । इसलिये मैं ध्रुव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता हूँ । सो भजन बन्दगी में भी अगर कोई रस नही आता, कोई आनंद या मज़ा नही आता , तो भी बैठो । बेरुखी , बेरुचि या डर से ही सही, लेकिन पूरा समय दो पता नही कब वो मालिक हमारी इस बेरुखी , बेरुचि और डर को प्रेम में बदल कर हमें जीत का सरताज पहना दे ।
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............"--कोई नहीं--".......... सीता के राम थे रखवाले; जब हरण हुआ तब कोई नहीं । द्रौपदी के पाँच पाण्डव ; जब चीर हरा तब कोई नहीं ।। दशरथ के चार दुलारे थे ; जब प्राण तजे तब कोई नहीं । रावण भी शक्तिशाली थे ; जब लंका जली तब कोई नहीं ।। श्री कृष्ण सुदर्शनधारी थे ; जब तीर चुभा तब कोई नहीं । लक्ष्मण भी भारी योद्धा थे ; जब शक्ति लगी तब कोई नहीं ।। शरशैय्या पर पड़े पितामह ; पीड़ा का सांझी कोई नहीं । अभिमन्यु राजदुलारे थे ; पर चक्रव्यूह में कोई नहीं ।। मैं तुम से कहूँ दुनिया वालो ; सँसार में अपना कोई नहीं । जो लेख लिखे उस मालिक ने ; उस लेख के आगे कोई नहीं ।। *आख़िर क्षण में उस "मदन"*; *और "मदन के नाम" बिना,* *कोई नहीं-कोई नहीं ।।*😢 🙏🏽 *सो भज मन मदन मदन मदन'अभी से-आज से' भज मन मदन मदन मदन* 🙏🏽
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🌸🌿💥🌸🌿💥🌸🌿💥🌸 जब किसी में गुण दिखाई दे तो मन को "कैमरा" बना लीजिए और जब किसी में "अवगुण" दिखाई दे तो "मन" को "आईना" बना लीजिए... 🙏जय श्री मदन जी🙏 🌹सुप्रभात🌹 🌸🌿💥🌸🌿💥🌸🌿💥🌸
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आदरणीय प्रधानमंत्री जी, आपने गुजरात सीएम रहते हुए जीएसटी, एफबीआई, आधार, मनरेगा और पेट्रोल कीमतो का विरोध किया जबकि पीएम बनते ही इन सभी का स्वागत किया एवं पेट्रोल कीमतो में दिल खोलकर वृद्धि की.. देश आपको आपके इस थूककर चाटने वाले योगदान के लिए हमेशा याद रखेगा 👍
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*मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए जो मुझे चिंतित करती है। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* जिन्होंने मुझे चोट दी है मुझे उन्हें चोट नहीं देनी है। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक देती हैं *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगा जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है। इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे। यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा। *मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि...* जिंदगी तब बेहतर हो जाती है जब आप इसे अपने आसपास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उसपर केंद्रित कर देते हैं जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है। आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि चिंतित करने वाली हर छोटी-छोटी बात पर प्रतिक्रिया 'नहीं' देना एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का 'प्रथम अवयव' है 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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धुंआ दर्द बयाँ करता है,और राख कहानियां छोड़ जाती है कुछ लोगों की बातों में भी दम नही होता कुछ लोंगो की खामोशियाँ भी निशानियां छोड़ जाती है
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💞💞II Krishna II💞💞 💞 Krishna is utterly incomparable, he is so unique. 💞Firstly, his uniqueness lies in the fact that although Krishna happened in the ancient past he belongs to the future, is really of the future. 🌸Man has yet to grow to that height where he can be a contemporary of Krishna's. 💞 He is still beyond man's understanding; he continues to puzzle and battle us. Only in some future time will we be able to understand him and appreciate his virtues. And there are good reasons for it. 🌸The most important reason is that Krishna is the sole great man in our whole history who reached the absolute height and depth of religion, and yet he is not at all serious and sad, not in tears. 🌸 By and large, the chief characteristic of a religious person has been that he is somber, serious and sad-looking - like one vanquished in the battle of life, like a renegade from life. In the long line of such sages it is Krishna alone who comes dancing, singing and laughing. 🌸Religions of the past were all life-denying and masochistic, extolling sorrow and suffering as great virtues. 🌸If you set aside Krishna's vision of religion, then every religion of the past presented a sad and sorrowful face. A laughing religion, a religion that accepts life in its totality is yet to be born. And it is good that the old religions are dead, along with them. It is said of Jesus that he never laughed. It was perhaps his sad look and the picture of his physical form on the cross that became the focal point of at traction for people, most of whom are themselves unhappy and miserable. In a deep sense Mahavira and Buddha are against life too. They are in favor of some other life in some other world; they support a kind of liberation from this life. 🌸Every religion, up to now, has divided life into two parts, and while they accept one part they deny the other, Krishna alone accepts the whole of life. 🌸Acceptance of life in its totality has attained full fruition in Krishna. That is why India held him to be a perfect incarnation of God, while all other incarnations were assessed as imperfect and incomplete. Even Rama is described as an incomplete incarnation of God. But Krishna is the whole of God. And there is a reason for saying so. The reason is that Krishna has accepted and absorbed everything that life is. 🌸Albert Schweitzer made a significant remark in criticism of the Indian religion. He said that the religion of this country is life negative. This remark is correct to a large extent, if Krishna is left out. But it is utterly wrong in the context of Krishna. If Schweitzer had tried to understand Krishna he would never have said so. But it was unfortunate that we did not allow Krishna to influence our life in a broad way. 🌸 He remains a lonely dancing island in the vast ocean of sorrow and misery that is our life. Or, we can say he is a small oasis of joyous dancing and celebration in the huge desert of sadness and negativity, of suppression and condemnation that we really are. 🌸Krishna could not influence the whole spectrum of our life, and for this we are alone to blame. Krishna is not in the least responsible for it. We were not that worthy, that deserving, to have him, to imbibe him, to absorb him. 💞💞OSHO💞💞 🌸Krishna: The Man & His Philosophy 🌸
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*एक लघु कथा* दुनिया क्या कहेगी... एक *साधू* किसी नदी के पनघट पर गया और पानी पीकर पत्थर पर सिर रखकर सो गया....!!! पनघट पर पनिहारिन आती-जाती रहती हैं!!! तो पनिहारिन आईं तो एक ने कहा- *"आहा! साधु हो गया, फिर भी तकिए का मोह नहीं गया*... *पत्थर का ही सही, लेकिन रखा तो है।"* पनिहारिन की बात साधु ने सुन ली... *उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया*... दूसरी बोली-- *"साधु हुआ, लेकिन खीज नहीं गई..* *अभी रोष नहीं गया,तकिया फेंक दिया।"* तब साधु सोचने लगा, अब वह क्या करें ? तब तीसरी बोली-- *"बाबा! यह तो पनघट है,यहां तो हमारी जैसी पनिहारिनें आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेंगी, उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे?"* लेकिन चौथी ने बहुत ही सुन्दर और एक बड़ी अद्भुत बात कह दी- *"क्षमा करना,लेकिन हमको लगता है,तूमने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है,अभी तक वहीं का वहीं बने हुए है।* *दुनिया पाखण्डी कहे तो कहे, तुम जैसे भी हो,हरिनाम लेते रहो।"* *सच तो यही है, दुनिया का तो काम ही है कहना...* आप ऊपर देखकर चलोगे तो कहेंगे... *"अभिमानी हो गए।"* नीचे देखोगे तो कहेंगे... *"बस किसी के सामने देखते ही नहीं।"* आंखे बंद करोगे तो कहेंगे कि... *"ध्यान का नाटक कर रहा है।"* चारो ओर देखोगे तो कहेंगे कि... *"निगाह का ठिकाना नहीं। निगाह घूमती ही रहती है।"* और परेशान होकर आंख फोड़ लोगे तो यही दुनिया कहेगी कि... *"किया हुआ भोगना ही पड़ता है।"* *ईश्वर*👆🏻को राजी करना आसान है, लेकिन 🌍*संसार* को राजी करना असंभव है.... *दुनिया* क्या कहेगी, उस पर ध्यान दोगे तो....???? *आप अपना ध्यान नहीं लगा पाओगे. एक पुरानी *कहावत* है, आप ताले का *मुंह* तो बंद कर सकते हो पर इंसान का *मुंह* बंद नही कर सकते हो
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