एक अजीब किस्म की नास्तिकता कहानी मैंने सुनी है। एक गांव में एक नास्तिक था। बड़ा तार्किक, बड़ा बौद्धिक। गांव के आस्तिक उससे हार चुके थे। गांव के महात्मा, पंडित, पुरोहित, सब उससे हाथ जोड़ लिए थे। आखिर एक परिव्राजक संन्यासी गांव में आया। उस नास्तिक ने उससे भी विवाद किया। उस संन्यासी ने कहा कि मुझसे न करो विवाद, मुझसे समय न गंवाओ; मुझे खुद ही पता नहीं है, खोज रहा हूं, कह नहीं सकता कि ईश्वर है, इसलिए यह तो कैसे कहूं कि तुम गलत हो। मुझे सत्य का खुद को ही पता नहीं है। लेकिन एक आदमी है जो जानता है। तुम वहां चले जाओ। व्यर्थ यहां समय खराब न करो—अपना और दूसरों का। उस आदमी से तुम्हें मिल जाएगा। अगर जवाब मिल सकता है तो उस आदमी से मिल सकता है। और मैं सारा देश घूम चुका हूं, बस वह एक आदमी है जो तुम्हें तृप्ति दे दे तो दे दे, न दे तो समझना कि तृप्ति तुम्हारे भाग्य में ही नहीं है। “कौन वह आदमी है?” पूछा उस नास्तिक ने। तो उसने एक फकीर का नाम लिया। चल पड़ा नास्तिक उस फकीर की तलाश में। वह फकीर एक मंदिर में ठहरा हुआ था। सुबह हुए तो देर हो चुकी थी, अब तो नौ बज रहे थे। सारी दुनिया जाग गयी थी। आलसी से आलसी भी जाग गये थे और फकीर अभी मस्त नींद में सोया हुआ था। इतना ही नहीं, शंकरजी की पिंडी पर पैर रखे हुए था। नास्तिक की तो छाती दहल गयी। उसने कहा: यह तो कोई महानास्तिक है। मैं विवाद करता हूं जरूर, ईश्वर नहीं है, ऐसे तर्क भी देता हूं लेकिन शंकरजी की पिंडी पर पैर रखकर लेटने की हिम्मत मेरी भी नहीं, पता नहीं, कौन जाने, ईश्वर हो ही, फिर पीछे झंझट आये। तर्क और विवाद तो ठीक है मगर कृत्य…ऐसा नास्तिक कृत्य तो मैं भी नहीं कर सकता। इस आदमी ने भी किसके पास भेज दिया! यह तो महागुरु है, हमसे भी बहुत आगे गया हुआ है। और यह कोई समय है संन्यासी के सोने का? सारी दुनिया जग गयी। आलसी से आलसी आदमी भी जग गया। जो रात आधी रात तक जागा था, वह भी जग गया। और ये महापुरुष अभी सो रहे हैं! और शास्त्र कहते हैं कि जाग जाना चाहिए साधक को ब्रह्ममहूर्त में। और इनके संबंध में मुझे बताया गया कि ये साधक नहीं सिद्ध हैं। झकझोर कर फकीर को जगाया। फकीर ने आंख खोली। उस नास्तिक ने पूछा कि पूछने तो बहुत प्रश्न हैं लेकिन पहले दो प्रश्न जो अभी अभी उठे हैं और ताजे हैं। पहला तो यह कि साधु संन्यासियों को ब्रह्ममहूर्त में उठना चाहिए, आप अब तक क्यों सो रहे हैं? वह फकीर हंसने लगा। उसने कहा: मैंने एक राज समझ लिया है कि जब आंख खोलो तब ब्रह्ममहूर्त। और तो कोई ब्रह्ममहूर्त है ही नहीं। जब तक आंख बंद तब तक रात। हम ब्रह्ममहूर्त में नहीं उठते, हम जब उठते हैं तब ब्रह्ममहूर्त होता है। यह बात बड़ी गहरी है। ऊपर से तो लगे कि जैसे फकीर मजाक कर रहा है, हल्की—फुलकी बात कह रहा है। लेकिन उसने सारे शास्त्रों का सार कह दिया। सारे सदगुरुओं का निचोड़ इतना ही है कि आंख खोलो तो सुबह और आंख बंद रही तो रात। नास्तिक ने कहा कि मेरा मुंह बंद कर दिया। मेरा मुंह आज तक कोई बंद नहीं कर सका। मगर मैं अब तुमसे क्या कहूं! तुम भी ठीक ही कह रहे हो। और दूसरा प्रश्न—शंकरजी की पिंडी पर पैर क्यों रखे हो? तो उस फकीर ने कहा: और कहां पैर रखूं? जहां है वही है। जहां पैर रखूं उसी के सिर पर पड़ते हैं। यह पृथ्वी भी उसी का पिंड है। यह छोटी सी पिंडी है, यह जरा बड़ा पिंड है। और बड़े पिंड हैं, महापिंड हैं सूरज है, महासूर्य है। कहां पैर रखूं? आखिर कहीं तो रखूं? पैर दिये हैं तो रखूंगा? और तू कौन है पूछने वाला? जब मुलाकात मेरी होगी तो आमने सामने बात हो लगी कि पैर क्यों दिये थे पैर दिये थे तो कहें तो रखूंगा! और फिर पिंडी में शंकर हैं, और मेरे पैरों में नहीं? पत्थर में शंकर हैं, और मुझ जीवित देह में नहीं? जब से जागा हूं तब से वही बाहर है, वही भीतर है बस वही है। ----osho---

Comments

Popular posts from this blog

🌷 *राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर*🌷 ♨ *।। कोई अर्थ नहीं।।* ♨ नित जीवन के संघर्षों से जब टूट चुका हो अन्तर्मन, तब सुख के मिले समन्दर का *रह जाता कोई अर्थ नहीं*।। जब फसल सूख कर जल के बिन तिनका -तिनका बन गिर जाये, फिर होने वाली वर्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन यदि दुःख में साथ न दें अपना, फिर सुख में उन सम्बन्धों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* छोटी-छोटी खुशियों के क्षण निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* मन कटुवाणी से आहत हो भीतर तक छलनी हो जाये, फिर बाद कहे प्रिय वचनों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सुख-साधन चाहे जितने हों पर काया रोगों का घर हो, फिर उन अगनित सुविधाओं का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* :::बहुत सुंदर मार्मिक ह्रदयस्पर्शी कविता

🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 *🔥सबसे ऊँची प्रार्थना🔥* *एक व्यक्ति जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया । वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।" उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, "हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, "ईश्वर मेरी मदद करो ।" उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ । फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा । वह एक नेता से मिला, उसने कहा "ईश्वर को वोट दो" यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई । वह बहुत उदास हुआ उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।" उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया । उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, *"हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।" अचानक वह चौंक पड़ा और चिल्लाया की "अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।" उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-"हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद"........और उसके सिक्के बढ़ते गए... बढ़ते गए... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।" यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है । ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं । मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता । उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।* *ऊपर दी गई कहानी से समझें की "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं । अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, "ईश्वर तुम्हार धन्यवाद ।" ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद !" और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, "धन्यवाद ।" आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें - पहली "साँस का चलना" दूसरी "सत्य की प्यास ।" यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी । भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद ।* *सभी को धन्यवाद*🌼🌸🌼 🐄🐄🐄🐄🙏🐄🐄🐄🐄