श्रद्धेय अटल जी के गंभीर रूप से अस्वस्थ्य होने के समाचार आ रही। उनके स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से प्रार्थना। उन्ही की एक कविता- ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, किसी मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत की उम्र क्या ? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं। मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ? तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा। मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न सगों से रहा कोई बाक़ी गिला। हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है। पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तूफ़ाँ का तेवर, नदी तन गई। मौत से ठन गयी!! मौत से ठन गयी!!

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