मेरी सूरति सुहागन जाग री। का तू सोबे मोह नींद में उठके भजन बीच लाग री। अनहद शबद सुनो चित्त देके झड़त मधुर धुन राग री। चरण शीश दे विनती करियो पाओगी अटल सुहाग री। कहत कबीर सुनो भाई साधो जगत पीठ दे भाग री। मेरी सुरति सुहागन बाग री।

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