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एक पुरानी कहानी तुमसे कहूं—झेन कथा है।
एक झेन सदगुरु के बगीचे में कद्दू लगे थे।
सुबह—सुबह गुरु बाहर आया तो देखा,
कद्दूओ में बड़ा झगड़ा और विवाद मचा है।
कद्दू ही ठहरे! उसने कहा : 'अरे कद्दूओ यह क्या कर रहे हो?
आपस में लड़ते हो !' वहा दो दल हो गए थे
कद्दूओं में और मारधाड़ की नौबत थी।
झेन गुरु ने कहा 'कद्दूओ, एक—दूसरे को प्रेम करो।'
उन्होंने कहा 'यह हो ही नहीं सकता। दुश्मन को प्रेम करें?
यह हो कैसे सकता है !' तो झेन गुरु ने कहा, 'फिर ऐसा करो, ध्यान करो।
' कदुओं ने कहा. 'हम कद्दू हैं, हम ध्यान कैसे करें ?'
तो झेन गुरु ने 'कहा : 'देखो—भीतर मंदिर में बौद्ध भिक्षुओं की कतार ध्यान करने बैठी थी—देखो ये कद्दू इतने कद्दू ध्यान कर रहे हैं।'
बौद्ध भिक्षुओं के सिर तो घुटे होते हैं, कदुओं जैसे ही लगते हैं।
’तुम भी इसी भांति बैठ जाओ।' पहले तो कद्दू हंसे, लेकिन सोचा
'गुरु ने कभी कहा भी नहीं; मान ही लें, थोड़ी देर बैठ जाएं।'
जैसा गुरु ने कहा वैसे ही बैठ गए—सिद्धासन में पैर मोड़ कर आंखें बंद करके, रीढ़ सीधी करके। ऐसे बैठने से थोड़ी देर में शांत होने लगे।
सिर्फ बैठने से आदमी शांत हो जाता है।
इसलिए झेन गुरु तो ध्यान का नाम ही रख दिये हैं. झाझेन।
झाझेन का अर्थ होता है. खाली बैठे रहना, कुछ करना न।
कद्दू बैठे—बैठे शांत होने लगे, बड़े हैरान हुए, बड़े चकित भी हुए!
ऐसी शांति कभी जानी न थी।
चारों तरफ एक अपूर्व आनंद का भाव लहरें लेने लगा।
फिर गुरु आया और उसने कहा : 'अब एक काम और करो,
अपने— अपने सिर पर हाथ रखो।’ हाथ सिर पर रखा तो और चकित हो गए।
एक विचित्र अनुभव आया कि वहा तो किसी बेल से जुड़े हैं।
और जब सिर उठा कर देखा तो वह बेल एक ही है, वहां दो बेलें न थीं,
एक ही बेल में लगे सब कद्दू थे। कदुओं ने कहा : 'हम भी कैसे मूर्ख!
हम तो एक ही के हिस्से हैं, हम तो सब एक ही हैं,
एक ही रस बहता है हमसे—और हम लड़ते थे।’ तो गुरु ने कहा. 'अब प्रेम करो।
अब तुमने जान ?? कि एक ही हो, कोई पराया नहीं। एक का ही विस्तार है।’
वह जहां से कदुओं ने पकड़ा अपने सिर पर,
उसी को योगी सातवां चक्र कहते हैं : सहस्रार।
हिंदू वहीं चोटी बढ़ाते हैं। चोटी का मतलब ही यही है कि
वहा से हम एक ही बेल से जुड़े हैं। एक ही परमात्मा है।
एक ही सत्ता, एक अस्तित्व, एक ही सागर लहरें ले रहा है।
वह जो पास में तुम्हारे लहर दिखाई पड़ती है, भिन्न नहीं, अभिन्न है;
तुमसे अलग नहीं, गहरे में तुमसे जुड़ी है। सारी लहरें संयुक्त हैं।
तुमने कभी एक बात खयाल की?
तुमने कभी सागर में ऐसा देखा कि एक ही लहर उठी हो
और सारा सागर शांत हो? नहीं, ऐसा नहीं होता।
तुमने कभी ऐसा देखा, वृक्ष का एक ही पत्ता हिलता हो
और सारा वृक्ष मौन खड़ा हो, हवाएं न हों?
जब हिलता है तो पूरा वृक्ष हिलता है।
और जब सागर में लहरें उठती हैं तो अनंत उठती हैं, एक लहर नहीं उठती। क्योंकि एक लहर तो हो ही नहीँ सकती।
तुम सोच सकते हो कि एक मनुष्य हो सकता है पृथ्वी पर? असंभव है।
एक तो हो ही नहीं सकता। हम तो एक ही सागर की लहरें हैं,
अनेक होने में हम प्रगट हो रहे हैं। जिस दिन यह अनुभव होता है,
उस दिन प्रेम का जन्म होता है।
प्रेम का अर्थ है : अभिन्न का बोध हुआ, अद्वैत का बोध हुआ।
शरीर तो अलग— अलग दिखाई पड ही रहे हैं,
कद्दू तो अलग— अलग हैं ही, लहरें तो ऊपर से
अलग—अलग दिखाई पड़ ही रही हैं— भीतर से आत्मा एक है।
प्रेम का अर्थ है. जब तुम्हें किसी में और अपने बीच एकता का अनुभव हुआ।
और ऐसा नहीं है कि तुम्हें जब यह एकता का अनुभव होगा तो एक
और तुम्हारे बीच ही होगा; यह अनुभव ऐसा है कि हुआ
कि तुम्हें तत्क्षण पता चलेगा कि सभी एक हैं।
भ्रांति टूटी तो वृक्ष, पहाड़—पर्वत, नदी—नाले,
आदमी—पुरुष, पशु —पक्षी, चांद—तारे सभी में एक ही कंप रहा है।
उस एक के कंपन को जानने का नाम प्रेम है।
प्रेम प्रार्थना है।
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