• क्षमताएँ और शक्तियाँ , प्रामाणिक सत्य का मार्ग नहीं हैं । √ ऐसी ही घटना रामकृष्ण के समय में भी हुई .... उनका एक शिष्य था --- विवेकानन्द ; जिसे अब पहिली बार सटोरी घटी तो उसने अपने अन्दर एक दिव्य शक्ति का अनुभव किया । और रामकृष्ण के आश्रम में ही कालू नाम का एक साधारण सा भोला-भाला व्यक्ति था । वह इतना अधिक सीधा सादाऔर बच्चे की तरह भोला था कि विवेकानंद उसका हमेशा उपहास उड़ाते हुए उसे बहुत तंग किया करते थे । विवेकानंद बहुत अधिक विद्वान और तर्कनिष्ठ थे , जब कि यह कालू एक साधारण-सा देहाती था । और वह पूजा पाठ किया करता था । उसकी कोठरी या कमरा ही एक पूरा मंदिर था , जिसमें सैकड़ों देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थी -- और भारत में तुम जितने भी देवताओं की मूर्तियां चाहो , उन्हें खरीद सकते हो । कोई भी पत्थर देवता बन जाता है । तुम उस पर बस लाल-नारंगी रंग पोत दो और वह देवता बन सकता है । इसलिए उसके छोटे से कमरे में तीन सौ देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थी । यहाँ तक कि उसके सोने के लिए भी पर्याप्त स्थान नहीं बचा था । और तीन सौ देवताओं की वह प्रतिदिन पूजा-पाठ किया करता था , जिसमें उसे छ: से लेकर आठ घण्टे तक लग जाते थे , और शाम तक पूजा पाठ समाप्त करने के बाद ही वह भोजन किया करता था । विवेकानंद उससे हमेशा कहते रहते थे -- तू मूर्ख है , तू किस मूढ़ता में पड़ा है । तू इन सभी मूर्तियों को गंगा जी में विसर्जित कर दे । लेकिन कालू इतना अधिक सीधा सादा था कि वह उत्तर देता था --- मैं इन मूर्तियों से प्रेम करता हूँ । बहुत सुन्दर हैं , और मैंने इन शालिग्राम जैसे पत्थरों को गंगा जी से ही तो प्राप्त किया है , स्वयं गंगा जी ने ही इन्हें मुझे भेंट किया है । अब मैं इन्हें वापस गंगा जी में कैसे फेंकसकता हूँ ? नहीं , मैं ऐसा नहीं कर सकता । जिस दिन विवेकानंद को पहिली सटोरी लगी , वह कालू के कमरे के ही निकट वाले दूसरे कमरे में बैठे हुए थे । पहिली शक्ति मिलते ही उनके मन में तेजी से यह विचार आया कि कालू जरूर ही इस समय पूजा पाठ कर रहा होगा । इसलिए केवल खेल-खेल में उन्हें एक विचार सूझा और अपने कमरे में बैठे हुए ही उन्होंने वह विचार कालू के मन में प्रक्षेपित करते हुए आदेश दिया -- " कालू , अब तुम अपने देवताओं की सभी मूर्तियों को ले जाकर गंगाजी में फेंक दो । " उन्होंने वहाँ उन शक्ति का अनुभव किया था , इसलिए वह यह विचार प्रक्षेपित कर सके और वह कालू द्वारा प्राप्त किया गया । रामकृष्ण बाहर बैठे हुए थे । उन्होंने अपने अंतर्ज्ञान से उस खेल को देखा --- जो कुछ विवेकानंद ने खेला था । उन्होंने जरूर ही उस विचार को प्रक्षेपित होते हुए देखा था । लेकिन उन्होंने प्रतीक्षा की । तभी कालू एक बड़ा बंडल लिए बाहर निकला । वह सभी देवताओं की मूर्तियों को एक बड़े थैले में ले जा रहा था । रामकृष्ण ने उसे रोकते हुए कहा , " रुको , तुम कहाँ जा रहे हो । " कालू ने उत्तर दिया , " मेरे मन में अचानक एक विचार आयाकि यह सभी कुछ मूढ़ता है , इसलिए मैं सभी मूर्तियों को फेंकने जा रहा हूँ मैं खतम ही हो गया । " रामकृष्ण ने कहा , " तुम ठहरो । मैं विवेकानंद को बुलाता हूँ । "विवेकानंद को बुलाया गया और रामकृष्ण ने चीखते हुए क्रोधित होकर उनसे कहा , " क्या शक्ति के प्रयोग करने का यही तरीका है ? " और उन्होंने कालू ने कहा , " तू अपने कमरे में वापस जा और अपने देवताओं को वापस वहीं रख दे , जहाँ से उन्हें उठाया था । यह तेरा विचार न होकर विवेकानंद का विचार है । " तब कालू ने कहा , "मैंने ऐसा अनुभव किया जैसे कोई व्यक्ति मुझ पर पत्थर जैसी चोट कर रहा था और मैं कुछ भी समझ ही नहीं सका कि क्या कुछ घट रहा है । और उस विचार ने जैसे मुझे पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया और भय से बुरी तरह काँपने लगा -- मैं क्या कर रहा था , मुझे कुछ भी पता नहीं , लेकिन मैं लगभग किसी के द्वारा नियन्त्रित होकर ही वह सब कुछ कर रहा था । " रामकृष्ण , विवेकानंद से इतने अधिक रुष्ट हो गये कि उन्होंने उनसे कहा , " अब मैं तुम्हारी कुंजी , अपने पास रखूँगा । तुम इस कुंजी को अपनी मृत्यु के तीन दिनों पहिले ही प्राप्त कर सकोगे , तुम्हें अब कभी भी कोई सटोरी नहीं घटेगी । " और यह सब कुछ ऐसे ही हुआ । विवेकानंद को फिर कोई दूसरी सटोरी नहीं लगी । वह वर्षों तक रोते और बिलखते रहे , पर फिर भी वह उसे पा न सके । उन्होंने कठोर प्रयास किए । जब रामकृष्ण शरीर छोड़ रहे थे , तो उन्होंने रोते बिलखते हुए कहा , " कृपया , मुझे कुंजी वापस दे दीजिए । " और रामकृष्ण ने कहा -- " तुम उसे मरने के ठीक तीन दिन पहिले ही प्राप्त कर सकोगे , क्योंकि तुम खतरनाक बनते दिखाई देते हो । ऐसी शक्ति का प्रयोग इस तरह से नहीं कियाजाता । तुम अभी भी परिपूर्ण शुद्ध नहीं हो । तुम प्रतीक्षा करो । तुम रोते बिलखते रहो , और ध्यान भी करते रहो । " और विवेकानंद के मरने के ठीक तीन दिन पहिले उन्हें दूसरी सटोरी लगी । तभी उन्होंने जाना कि उनकी मृत्यु आ पहुँची है और केवल तीन दिन ही बचे हैं । स्मरण रहे , तुम शक्ति को अधिकार और नियन्त्रण में कर सकते हो , पर परमात्मा को नहीं -- लेकिन ऐसी शक्ति आध्यात्मिक नहीं हो सकती । परमात्मा को तुम अपने अधिकार में नहीं रख सकते , तुम्हें ही , ........ परमात्मा के अधिकार में रहना होगा । 🌱 ओशो अंतर्यात्रा के पथ पर सहभागिता और सहअस्तित्व का असीम अनुभव से संकलित । ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

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