*कायस्थों के अस्तित्व और स्वाभिमान को प्रदर्शित करने वाली कविता जो किसी ने भेजी थी, अच्छी लगी तो सोचा सबसे share करूँ :- सूर्य रश्मियाँ जब भी बोझिल हुईं अंधेरी रातों से, सदा मिली है ताकत इनको कागज कलम दवातों से, तुम वंशज हो चित्रगुप्त के जग में शान तुम्हारी है, कागज कलम दवात सदा से ही पहचान तुम्हारी है, सकल श्रृष्टि के निर्माता तुम ब्रम्हा जी के प्यारे हो, प्रखर प्रवर्तक बुद्धि लिए माँ शक्ति के भी दुलारे हो, धर्मराज बन स्वयं न्याय की रेखा रखने वाले हो, सारे जग के ही कर्मों का लेखा रखने वाले हो, सम्मानित हो पूज्यनीय हो थाह दिखाने वाले हो, अन्धकार में भी प्रकाश की राह दिखाने वाले हो, दुनिया भर में निज संस्कृति का गान कराने वाले हो, बुद्धिमान को बुद्धिमता का भान कराने वाले हो, तुम भारत के गौरव हो तुम राष्ट्र के खातिर डटे रहे, जातिवाद में नहीं पटे पर राष्ट्रवाद पर अटे रहे, श्वेत चन्द्र आभास तुम्हीं हो सूरज का प्रकाश तुम्हीं हो, धरती व आकाश तुम्हीं हो गौरवमयी इतिहास तुम्हीं हो, खड्गों की टंकार तुम्हीं हो पावन गंगा धार तुम्हीं हो, जलता इक अंगार तुम्हीं हो ठाकरे की हुँकार तुम्ही हो, *स्वतंत्रता की आश तुम्हीं थे दुनिया भर में ख़ास तुम्हीं थे,* *आजाद हिन्द करवाने वाले नेता वीर सुभाष तुम्हीं थे,* *पुष्पों के मकरंद तुम्हीं हो कवि चेतन के छंद तुम्हीं हो,* *ये भगवा स्वछन्द तुम्हीं हो स्वामी विवेकानन्द तुम्हीं हो,* मोहक चन्दन बाग़ तुम्हीं हो होली वाली फाग तुम्हीं हो, हास्य और अनुराग तुम्हीं हो तानसेन के राग तुम्हीं हो, राष्ट्रपति के भी सुर तुम थे, संविधान के भी उर तुम थे, धूल चटा दे जो दुश्मन को, शाश्त्री लाल बहादुर तुम थे, प्रेमचन्द गोदान तुम्हीं थे महादेवी पहचान तुम्हीं थे, वृन्दावन सी शान तुम्हीं थे संपूर्णानंद की जान तुम्हीं थे, *सोनू की आवाज तुम्हीं हो बच्चन का अंदाज तुम्हीं हो,* *ध्यानचंद की हॉकी हो तुम बॉलीवुड का ताज तुम्हीं हो,* *ऊँच नीच पे कहर तुम्हीं थे गीत गजल की बहर तुम्हीं थे,* *सोई सरकार जगाने वाली जयप्रकाश की लहर तुम्हीं थे,* अपना अतीत अपना गौरव कहीं और ना खो जाए, बुद्धिजीवियों की बिसात बिल्कुल बौनी ना हो जाए, आपस की बस खींचतान में हम पिछड़े ना रह जायें, औरों के घर को सीच सींच न मकाँ हमारे ढह जायें, कुशाग्र बुद्धि वालों के कलमें कहीं सुप्त न हो जायें, बदले बदले इस मिजाज में हम विलुप्त न हो जायें, इसीलिये हे कायस्थ बन्धुओं शक्ति की पहचान करो, तुम वंशज हो चित्रगुप्त के मिलकर के आह्वान करो, एक सूत्र में बंधो कलम की धारें आज मिला दो तुम, सागर की गहराई में पतवारें आज मिला दो तुम, स्वयं तरक्की करो साथ में सबका ही उत्थान करो, जितना भी हो सके देश के लोगों का कल्याण करो, अपने हित के लिए लड़ो पर धर्म एक है ध्यान रहे, हिन्दू हिन्दू भाई भाई हिन्दू अपनी पहचान रहे, अपना गौरव नहीं रहा है केवल बस तलवारों से, आर्याव्रत था विश्वगुरु कृपाण कलम की धारों से, *कलम चलाओं धर्म सनातन की तुम पूर्ण सुरक्षा में,* *वक्त पड़े तो शीश कटा देना भारत की रक्षा में,* *(नोट- पसंद आने पर देश और दुनिया भर के अन्य कायस्थ बंधुओं तक पहुंचायें )

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🌷 *राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर*🌷 ♨ *।। कोई अर्थ नहीं।।* ♨ नित जीवन के संघर्षों से जब टूट चुका हो अन्तर्मन, तब सुख के मिले समन्दर का *रह जाता कोई अर्थ नहीं*।। जब फसल सूख कर जल के बिन तिनका -तिनका बन गिर जाये, फिर होने वाली वर्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन यदि दुःख में साथ न दें अपना, फिर सुख में उन सम्बन्धों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* छोटी-छोटी खुशियों के क्षण निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* मन कटुवाणी से आहत हो भीतर तक छलनी हो जाये, फिर बाद कहे प्रिय वचनों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सुख-साधन चाहे जितने हों पर काया रोगों का घर हो, फिर उन अगनित सुविधाओं का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* :::बहुत सुंदर मार्मिक ह्रदयस्पर्शी कविता

*एक सूफी कहानी : -* एक फकीर जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था, रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था। एक दिन उससे कहा कि सुन भाई, दिन— भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा। गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है! जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह फकीर यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा? मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो! फिर झूठ कहेगा भी क्यों? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है। कभी बोला भी नहीं इसके पहले। एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है। तो गया। लौटा फकीर के चरणों में सिर रखा और कहा कि मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ—लकड़ियां काटते—काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरूर जंगल है। मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता! फकीर ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है। दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात— आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती। एक दिन फकीर ने कहा; मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी— भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है? उसने कहा; यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है? उस फकीर ने कहा : चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकडिया—वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो—चार छ: महीने के लिए हो गया। अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार—छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। फकीर ने एक दिन कहा कि तुम कभी जागोगे कि नहीं, कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता? उसने कहा कि मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा? गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। फकीर ने कहा : थोड़ा और आगे सोने की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन फकीर ने कहा कि नासमझ, अब तू हीरों पर ही रुक गया? अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशांन न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है? उस फकीर ने कहा. *हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?* *रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों—जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है।* फकीर ने कहा : *उसी धन का नाम ध्यान है।* *अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे कीमती है!!! 💐🙏