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कौन ईश्वर कृपा से लाभान्वित हो सकता है ?
जैसे स्वाति के जल से मोती बनाने वाली सीपें ही लाभान्वित होती है । अमृत उसी को जीवन दे सकता है जिसका मुँह खुला हो , प्रकाश का लाभ आँखों वाले ही उठा सकते है । इन पात्रताओं के अभाव में प्रकाश कितना भी अधिक हो , अमृत या स्वाति का जल किसी का भी लाभ नहींउठाया जा सकता । ठीक यही बात देव उपासना के संबन्ध में लागू होती है । देवता और मन्त्रों का लाभ वे उठा पाते है जिन्होंने ने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से आचार-विचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है । औषध का लाभ तभी होता जब उसे बताये हुए अनुपात और समय पर लिया जाए । हमें मंत्र और देवता , भगवान और भक्ति के पीछे पड़ने से पहले आत्मशोधन की प्रक्रिया करनी पड़ेगी । इसलिए पहले आत्मउपासना फिर देव उपासना । आकाश में से बादल कितना ही जल क्यों न बरसाये , उसमें से जिसके पास जितना बड़ा पात्र होगा उसे उतना ही मिलेगा । आंगन में रखे पात्र में उतना ही जल रहेगा जितनी उसमें जगह होगी । इसलिए पात्रता नितांत आवश्यक है और पात्रता आत्मशोधन करके ही बढाई जा सकती है ।
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