प्रेम पशु-पक्षियों की आँखों में भी पढ़ा जा सकता है तो फिर प्रेम मनुष्य के हृदय में क्यों नहीं होना चाहिए। मनुष्य के हृदय में तो अथाह सागर है प्रेम का। आवश्यकता है उसे ग्रहण करने की, जीवन में अपनाने की। प्रेम ईश्वर की पूजा माना गया है। प्रेम ग्रहणीय है। प्रेम की आराधना करने वाला ही नैसर्गिक आनंद की अनुभूति करता है और वही इसका अधिकारी भी है। प्रेम सहज एवं स्वाभाविक है, बीज रूप है तथा व्यक्तित्व की आधारशिला है। ईश्वर की खोज करने वाला प्यार की खोज क्यों नहीं कर सकता। जबकि प्रेम साकार परमात्मा है। इसके अन्वेषण हेतु कोई बड़ा तप और त्याग नहीं करना पड़ता है। मात्र अपने विवेक को जागृत करना है। यह तो प्रकृति का सामान्य गुण धर्म है। प्रेम का मार्ग ही तो हम मनुष्यों को परमात्मा तक ले जाता है फिर क्यों नहीं हम प्रेम स्वरूप बन सकते हैं? क्यों फँसते जाते हैं सांसारिक द्वेष, छल-कपट में? प्रेम भी ईश्वर की तरह ही एक है। किंतु प्रेम के भी ईश्वर की तरह अनेक रूप हैं। एक माँ का अपनी संतान के प्रति जो मोह है वह प्रेम ही तो है। अपने परिवार एवं संबंधियों के प्रति जो मोह है वह भी प्रेम का ही एक रूप है। किंतु ये प्रेम स्वार्थी प्रेम कहलाता है। इस तरह के प्रेम से हम प्रेम स्वरूप नहीं बन पाएँगे, निःस्वार्थ प्रेम ही हम मनुष्यों को प्रेम स्वरूप बनाता है। निःस्वार्थ प्रेम हमें देश के प्रति, अपनी मातृभूमि के प्रति, हमारे हृदय में उमड़ते हुए हमें प्रेम स्वरूप बना देता है। ऐसे ईश्वर प्रेम के प्रतीक निःस्वार्थ, निश्छल और निष्कपट प्रेम ही भगवान का वरदान है।

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🌷 *राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर*🌷 ♨ *।। कोई अर्थ नहीं।।* ♨ नित जीवन के संघर्षों से जब टूट चुका हो अन्तर्मन, तब सुख के मिले समन्दर का *रह जाता कोई अर्थ नहीं*।। जब फसल सूख कर जल के बिन तिनका -तिनका बन गिर जाये, फिर होने वाली वर्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन यदि दुःख में साथ न दें अपना, फिर सुख में उन सम्बन्धों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* छोटी-छोटी खुशियों के क्षण निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* मन कटुवाणी से आहत हो भीतर तक छलनी हो जाये, फिर बाद कहे प्रिय वचनों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सुख-साधन चाहे जितने हों पर काया रोगों का घर हो, फिर उन अगनित सुविधाओं का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* :::बहुत सुंदर मार्मिक ह्रदयस्पर्शी कविता

🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 *🔥सबसे ऊँची प्रार्थना🔥* *एक व्यक्ति जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया । वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।" उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, "हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, "ईश्वर मेरी मदद करो ।" उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ । फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा । वह एक नेता से मिला, उसने कहा "ईश्वर को वोट दो" यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई । वह बहुत उदास हुआ उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।" उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया । उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, *"हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।" अचानक वह चौंक पड़ा और चिल्लाया की "अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।" उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-"हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद"........और उसके सिक्के बढ़ते गए... बढ़ते गए... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।" यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है । ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं । मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता । उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।* *ऊपर दी गई कहानी से समझें की "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं । अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, "ईश्वर तुम्हार धन्यवाद ।" ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद !" और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, "धन्यवाद ।" आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें - पहली "साँस का चलना" दूसरी "सत्य की प्यास ।" यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी । भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद ।* *सभी को धन्यवाद*🌼🌸🌼 🐄🐄🐄🐄🙏🐄🐄🐄🐄