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प्रेम पशु-पक्षियों की आँखों में भी पढ़ा जा सकता है तो फिर प्रेम मनुष्य के हृदय में क्यों नहीं होना चाहिए। मनुष्य के हृदय में तो अथाह सागर है प्रेम का। आवश्यकता है उसे ग्रहण करने की, जीवन में अपनाने की। प्रेम ईश्वर की पूजा माना गया है। प्रेम ग्रहणीय है। प्रेम की आराधना करने वाला ही नैसर्गिक आनंद की अनुभूति करता है और वही इसका अधिकारी भी है। प्रेम सहज एवं स्वाभाविक है, बीज रूप है तथा व्यक्तित्व की आधारशिला है।
ईश्वर की खोज करने वाला प्यार की खोज क्यों नहीं कर सकता। जबकि प्रेम साकार परमात्मा है। इसके अन्वेषण हेतु कोई बड़ा तप और त्याग नहीं करना पड़ता है। मात्र अपने विवेक को जागृत करना है। यह तो प्रकृति का सामान्य गुण धर्म है। प्रेम का मार्ग ही तो हम मनुष्यों को परमात्मा तक ले जाता है फिर क्यों नहीं हम प्रेम स्वरूप बन सकते हैं? क्यों फँसते जाते हैं सांसारिक द्वेष, छल-कपट में?
प्रेम भी ईश्वर की तरह ही एक है। किंतु प्रेम के भी ईश्वर की तरह अनेक रूप हैं। एक माँ का अपनी संतान के प्रति जो मोह है वह प्रेम ही तो है। अपने परिवार एवं संबंधियों के प्रति जो मोह है वह भी प्रेम का ही एक रूप है। किंतु ये प्रेम स्वार्थी प्रेम कहलाता है।
इस तरह के प्रेम से हम प्रेम स्वरूप नहीं बन पाएँगे, निःस्वार्थ प्रेम ही हम मनुष्यों को प्रेम स्वरूप बनाता है। निःस्वार्थ प्रेम हमें देश के प्रति, अपनी मातृभूमि के प्रति, हमारे हृदय में उमड़ते हुए हमें प्रेम स्वरूप बना देता है। ऐसे ईश्वर प्रेम के प्रतीक निःस्वार्थ, निश्छल और निष्कपट प्रेम ही भगवान का वरदान है।
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