कबीर जी ने कहा है कि कबीर मोहे मरने का चाव है , मरूँ हरी के द्वार मत हरी पूछे कौन पड़ा द्वार 2, जिस मरने से जग डरे , मोहे मरने में आनन्द कब मरू कब पाऊं पूर्ण परमानन्द इस अवस्था को पढ़ना तो आसान है , परन्तु समझना और समझाना बुहत कठिन है, अध्यात्मवाद में ऐसी अनेक महान आत्माएं हुई है , जिन्होंने अपना सर्वस्व कुर्बान कर देने पर भी उसका शुक्राना किया , सर्वशक्तिमान की रजा में राजी रहना और उससे नाराज न होना ही वास्तव में दुःख में सुख मनाना है । सदैव उसकी रजा में राजी रहना और उसके शुक्रगुजार रहना , जैसे आपके पिता ईश्वर से कभी नाराज नही होते , उनके शुक्रगुजार रहते है और आपसे प्यार भी करते हैं । वैसे ही ईश्वर प्रेमी मोह के बन्दन से ऊपर उठ कर कर्तव्य निभाता पर माया में नही उलझता । सभी को जय श्री मदन

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