पूर्ण परमेश्वर श्री मदन , हे! दीन बन्धु ,हे! दीन दयाला , भक्तजनों के रक्षक , हे! करुणा सिन्धु ,हे! कृपाला ।।1।। पूर्ण परमेश्वर श्री मदन जी , सर्वज्ञ सर्व्यापक सर्वशक्ति मान आद्यात्मिक शिक्षा का परीक्षण केंद्र , श्री मदन जी का धाम ।।२।। श्री ज्योति शक्ति श्री चरन ध्यान लगाये श्री ज्योति कृपा जिस जन, वही मदन शरण पाये , ।।३।। सर्वज्ञ , सर्व्यापक, सर्वशक्तिमान , हर गुण दर्शाए सोवें संगम युग धरा पर आये, श्री मदन जी नाम कहाये ।।4।। श्री मदन जी जग के सिरजन हारे , भक्त जनों के पालनहारे जनम- मरण सब छुटे, जीवन नैया भव पार उतारे ।।5।। पूर्ण परमेश्वर श्री मदन जी, सृष्टी सृजन हार। व्यापक अंतर बाहर में, पूर्ण परमेश्वर करतार ।।6।। ऋषि-मुनि सब संत जन, जपें श्री मदन जी का जाप। आत्मज्ञान पाय के, हृदय बसो श्री मदन जी आप ।।7।। श्री मदन नाम जो ले , श्री मदन चरण ध्यान लगाय। जन्म-मरण भय दुःख समटे, काल कबहु नहीं खाय ।।8।। श्री मदन नाम सुने, जनम जनम सुख पाय। मन वांनित कारज सरें, जन्म सफल हो जाय ।।9।। श्री मदन दीन दयाला, भक्तजनों के हो प्रनतपाला सोवें संगम युग धरो अवतारा, डूबत जग में जीवात्मा उबारा ।।10।। तेरा दरस करें बड़भागी, प्रेम की लगन श्री मदन संग लागी श्री मदन नाम जहाज तेरा सुखदाई, धारे जीव जनम मरण पार हो जाई ।।11।। पूर्ण परमेश्वर श्री मदन अविनाशी, साकार रूप सदा सुखदायी श्री मदन समान दाता कोई नाहीं, भक्त जन श्री चरण संग प्रीत लगायी ।।12।। पूर्ण परमेश्वर सन्मुख जब जीवात्मा जावे, कोटि कल्प के पाप नशावे जिस जन पर कृपा श्री मदन की होई, पूर्ण हो सब कमी न कोई ।।13।। पूर्व जन्म की तपस्या जागे, श्री मदन चरण सेवा में तब मन लागे श्री मदन चरण -सेवा सब सुख होवे, जनम अकारथ क्यों है खोवे ।।14।। श्री मदन चरण सेवा आत्म ज्ञानी जाने, मूरख बात नहीं पहचाने पूरण परमेस्वर श्री मदन नाम जपो दिन -राती, जन्म-जन्म का है यह साथी ।।15।। अन्न-धन लक्ष्मी जो सुख चाहे, श्री मदन सेवा में ध्यान लगावे श्री मदन अजर अमर अविनाशी, सिमटे भरम होए आत्म परकासी ।।16।। पूर्व पुण्य उदय सब होवे, मन अपना श्री मदन में खोवे श्री मदन सेवा में विघन जो लावे, उनका कुल नरकों में जावे ।।17।। यम का दूत दूर ही भागे, जिसका मन श्री मदन संग लागे भूत, पिशाच निकट ना आवे श्री मदन चरन जो शीश नवाये ।।18।। जो श्री मदन की सेवा करते, डाकन-शाकन सब हैं डरते जंतर-मंतर, जादू-टोना, श्री मदन भक्त के कछू नहीं होना ।।19।। पूर्ण परमेश्वर श्री मदनाए , पढे सुने चित दयां लगाये । अंतर ज्ञान प्रकाश हो, दरिद्रता दुःख जनम जनम दूर हो जाय ।।२०।। श्री मदन महिमा बेअंत है, पूरण परमेश्वर हैं परम दयाल। मोह माया का बन्धन टूटे , तन मन हो निहाल ।।21।। मात पिता आप श्री मदन जी, शरण पढू में किसकी , श्री मदन बिन और न दूजा, आस करू में किसकी ।।22।। पूर्ण परमेश्वर आप अंतर्यामी ,परब्रहम परमेश्वर अजर , अमर अविनाशी , सर्वज्ञ , सर्व्यापक, सर्वशक्तिमान, पूर्ण परमेश्वर श्री मदन मानकपुर वासी ।।23।। श्री मदन जीव- निर्जीव रचाए , स्वय हर नियम बनाये आप ही जीवन दाता, पूर्ण परमेश्वर श्री मदन कहाये।।24।। सद बुधि, निष्काम भक्ति का ,भक्त जनो को दीजे दान भूले हमरि क्षमा करो , बालक जान नादान।।25।। छल कपट पर निंदा , श्री मदन जी को न भाए अवगुण ऐसे तजकर, श्री मदन शरण पाए ।।26।। पूर्ण परमेश्वर श्री मदन का ,हर प्राणी से जुड़ा है नाता अकाल मृत्यु के भये से , सदा करते मुक्त दाता ।।27।। श्रध्दा, प्रेम लगन से, श्री मदन गुण निरंतर गाये धेर्य , शांति मन निर्मल , श्री मदन कृपा पाए।।28।। पूर्ण परमेश्वर श्री मदनाये, पूर्ण परमेश्वर श्री मदनाये

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🌷 *राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर*🌷 ♨ *।। कोई अर्थ नहीं।।* ♨ नित जीवन के संघर्षों से जब टूट चुका हो अन्तर्मन, तब सुख के मिले समन्दर का *रह जाता कोई अर्थ नहीं*।। जब फसल सूख कर जल के बिन तिनका -तिनका बन गिर जाये, फिर होने वाली वर्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन यदि दुःख में साथ न दें अपना, फिर सुख में उन सम्बन्धों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* छोटी-छोटी खुशियों के क्षण निकले जाते हैं रोज़ जहाँ, फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* मन कटुवाणी से आहत हो भीतर तक छलनी हो जाये, फिर बाद कहे प्रिय वचनों का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* सुख-साधन चाहे जितने हों पर काया रोगों का घर हो, फिर उन अगनित सुविधाओं का *रह जाता कोई अर्थ नहीं।।* :::बहुत सुंदर मार्मिक ह्रदयस्पर्शी कविता

🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀 *🔥सबसे ऊँची प्रार्थना🔥* *एक व्यक्ति जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे । उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया । वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।" उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, "हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, "ईश्वर मेरी मदद करो ।" उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ । फिर एक फादर से मिला, उन्होंने बताया की "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा । वह एक नेता से मिला, उसने कहा "ईश्वर को वोट दो" यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई । वह बहुत उदास हुआ उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी उसके दरवाजे पर आया । उसने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।" उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी को दे दिया । उस भिखारी ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, *"हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।" अचानक वह चौंक पड़ा और चिल्लाया की "अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।" उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-"हे ईश्वर तुम्हारा धन्यवाद"........और उसके सिक्के बढ़ते गए... बढ़ते गए... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया ।इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद ।" यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है । ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं । मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता । उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।* *ऊपर दी गई कहानी से समझें की "हे ईश्वर ! तुम्हारा धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं । अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं, "ईश्वर तुम्हार धन्यवाद ।" ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद !" और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, "धन्यवाद ।" आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें - पहली "साँस का चलना" दूसरी "सत्य की प्यास ।" यही प्यास हमें खोजी से भक्त बनाएगी । भक्ति और प्रार्थना से होगा आनंद, परम आनंद, तेज आनंद ।* *सभी को धन्यवाद*🌼🌸🌼 🐄🐄🐄🐄🙏🐄🐄🐄🐄