Skip to main content
*कोई भी मनुष्य किस बात को,*
*किस प्रकार से समझता है।*
*यह उसकी मानसिकता तय करती है।*
*कोई दूसरों की थाली में से भी,*
*छीन कर खाने में.. अपनी शान समझता है।*
*तो.. कोई अपनी थाली में से.. दूसरों को,*
*निवाले खिला कर.. संतुष्ट होता है।*
*सारा खेल.. केवल संस्कारों, समझ,*
*और.. मानसिकता का है।*
*लेकिन.. एक बात तो तयशुदा है कि.. छीन कर,*
*खाने वालों का.. कभी पेट नहीं भरता।*
*और.. बाँट कर खाने वाले,*
*कभी भी.. भूखे नहीं रहते।*
Popular posts from this blog
Comments
Post a Comment