*कोई भी मनुष्य किस बात को,* *किस प्रकार से समझता है।* *यह उसकी मानसिकता तय करती है।* *कोई दूसरों की थाली में से भी,* *छीन कर खाने में.. अपनी शान समझता है।* *तो.. कोई अपनी थाली में से.. दूसरों को,* *निवाले खिला कर.. संतुष्ट होता है।* *सारा खेल.. केवल संस्कारों, समझ,* *और.. मानसिकता का है।* *लेकिन.. एक बात तो तयशुदा है कि.. छीन कर,* *खाने वालों का.. कभी पेट नहीं भरता।* *और.. बाँट कर खाने वाले,* *कभी भी.. भूखे नहीं रहते।*

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