*जब दर्द और कड़वी बोली* *दोनों सहन होने लगे* *तो समझ लेना की..* *जीना आ गया ।।* *नदी जब निकलती है,* *कोई नक्‍शा पास नहीं होता कि "सागर" कहां है* *बिना नक्‍शे के सागर तक पहुंच जाती है।* *ऐसा नहीँ है कि नदी कुछ नहीँ करती है।* *उसको "सागर" तक पहुंचने के लिए लगातार "बहना" अर्थात "कर्म" करना पड़ता है।* *इसलिए "कर्म" करते रहिये,* *नक्शा तो ईश्वर पहले ही बनाकर बैठे है ।* *हमको तो सिर्फ "बहना" ही है ।।* **

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