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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
सबकुछ निर्मित युग्म रूप में, प्रकृति सजी है युगल रूप में।।
शक्ति जो छिपी हुई है,शरीर में ही बसी हुई है।।
शक्ति अध्यात्म कहलाती,भौतिक तन को वही चलाती।।
प्रायः जितने मंदिर होते हैं,या गुरुद्वारे सजे होते हैं।।
मंदिर मूरत विराजित होती, गुरुद्वारे को मुक्त ही रखती ।।
क्यों पुस्तक गुरु कहलाई,नवीन एक परिपाटी लाई।।
परम शक्ति आदेश दिए है,वाणी का संकलन किये है।।
ग्रंथ को साहिब शब्द दिया है,गुरु प्रथा को खत्म किया है।।
जब गुरु गोबिंद जी आदेश को पाये, गुरु ग्रन्थ साहिब कहलाये।।
शिव लिंग कच्चे दूध नहाए,कौन वहाँ आस्था करवाये।।
सजी मूर्तियां मंदिर सारे,करे पूर्ण को मनोरथ सारे।।
कोई जगह नहीं पूर्ण सिध्द है, भिन्न भिन्न इसके कई मत है।।
कर्ता कोई नहीं होता है,शक्ति खेल रच रचा होता है।।
जैसे स्वास्थ्य शरीर का होता, आत्मा का भी परिचय होता।।
व्यायाम करता है प्राणी,अन्तर्मन को खखोंले शक्ति वाणी।।
शक्ति चाहे मिलन स्वामी का, साक्षात्कार अन्तर्यामी का।।
नास्तिक उलझे दृश्य अदृश्य में, आस्तिक अज्ञान तिमिर में।।
माना नाशवान दृष्टिगोचर,अटके भटके लेकिन मध्य पर।।
सत्य असत्य भंवर में उलझे, अजर अमर को ही सब समझे।।
रंग बिरंगी नाना रंग प्रकृति के, कौन बनाये बिना शक्ति के।।
भू जल नभ सागर ये गहरे, रहस्य बड़े प्रकृति में ठहरे।।
देवी देव भगवान बनाये,नियमन कर् निर्जीव सजाये।।
आग का गोला प्रकाशित करता, भु का नियत परिक्रमण होता।।
मनुष्यय सर्वश्रेष्ठ भू प्राणी,लेकिन अक्षम है निर्माणी।।
वुद्धि विवेक दिया मानव को, राजदार बनाया उसको।।
अब धर्म मानव का है ये,अपने निर्माता को वो खोजे।।
उलझा निहित स्वार्थों प्राणी, विसरा कर सत्य की वाणी।।
जब जब मानव प्रयास किया है, परम शक्ति ने ज्ञान दिया है।।
कर्म संस्कार मनुष्यय के रहते, प्रीत विश्वास भाव जो होते।।
जिसकी चाहत यश मान प्रतिष्ठा, कोई कग सी रखता चेष्टा।।
त्याग समर्पण लगन आधारी, मनोकामना पूर्ण सेवा सारी।।
सत्य विहीन भीड़ के मारे,स्वारथ हेत काज हो सारे।।
भूले मान्यता जिन दीन्हीं,सत्य विवेक वुद्धि हर लीन्हीं।।
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