प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी प्रकट किया जबसे स्वयं को, किया प्रमानित प्रमाणों को शास्त्रों का ये ज्ञान नहीं है,सत्य प्रकाश प्रवाह यही है।। शक्ति क्या कार्य क्या करती, क्रियात्मक रूप में प्रमाणित करती।। साकार बने तो शिव या ब्रह्म है,आकारा रहित शक्ति रूप है।। शक्ति तो सर्वत्र ही कर्ता, नाम रूप ही सम्मुख रहता।। जिनकी आराध्य परम शक्ति है, महानआत्मा की भक्ति है।। वीर पीर गुरु देव कहलाये,इनसे ऊपर भगवान बनाये।। ठीक वृक्ष की भांति ही इनका, आध्यत्मवाद में महत्व होता ।। परम शक्ति एक मात्र रचयिता, शेष सभी इसकी ही रचना।। संत ऋषि मुनि ज्ञानी,या गुरु की कोई वाणी।। देवी देव या भगवान प्रदर्शन, भक्ति आधार है एक ही दर्पण।। रहस्यवाद आध्यत्मवाद है,गहराई में ज्ञान स्वाद है।। शारीरिक सुख मन की शांति,जग में रहकर जग से मुक्ति।। जैसे वृक्ष का मूल है शक्ति,फिर भरम या शिव भक्ति है।। ईश्वर की सृष्टि रचना है,विरक्ति भाव से प्रेम ही करना है।। नेककर्म व्यवहार नियम है, निस्वार्थ भक्ति और संयम है।। आध्यत्म में जितने भी विशेषण है,शक्ति की भक्ति का फल है।। प्रातः काल सुरभि सुर वेला,शक्ति इच्छा समय सुनहरा।। प्रकृति सुनाये संगीत अनोखा, खेल शक्ति का इंद्रधनुष की रेखा।। सैभाग्य से हमने ये सच पाया, जीने अपनी शरण बुलाया।। मन और तन का संगम है,जीवन सुखमय तभी सम्भव है।। मन हो प्रफुल्लित ईश कृपा है, शरीर क्रियाशील यहीं जुड़ा है।। ईश्वर की ये है अनेकम्पा,जुड़ा मन से ईश का नाता।। करूँ प्रणाम श्री चरणों में,रखना सदा अपनी शरण में।। परम शक्ति सर्व भूवन्दनी,सत्यम शिवम का अर्थ है यही।। 🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏

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