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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
ऊंचे पर्वत स्रंग बनाये,हिम से श्वेत शिखर सजाये
कलकल नदियां गीत सुनाये,कोयल पीहू सरगम गाये
खंजन गौरया और पंखुरी,दे पवन को भक्ति की लड़ी
प्रातः समीर कहे तरुवर से,करे वन्दनम परमेश्वर से
कुछ भी नहीं सृष्टि में व्यर्थ है,प्रत्येक रचना का अपना अर्थ है
दुःख सुख जीवन धूप छाँव है,कर्मो का ही ये फैलाव है
नहीं पराया हर कोई अपना,हर अपना पर है इक सपना
एक सर्वोच्च जो सकल सृष्टि में,परम शक्ति कहलाये जग में
सत्य ज्ञान का वोध कराए,मन मे प्रकाश का दीप जगाये
करो निरन्तर प्रेम सभी से,सद्व्यहार सदा ही सबसे
कर्मफल का आधार यही है,पाप पुण्य का सार यही है
नाम रूप और धर्म मुक्त है,ईश्वर सर्वत्र सर्वरूप है
जो कुछ मानव ने बनाया,समझ स्कन न ईश्वर की माया
हर आध्यत्म का मूल यही है,अंश ईश का सबमें वही है
करें वन्दना अंश यदि जागे,सत्य असत्य का वोध हो आगे
जिसको ज्ञानी रहे खोजते,जंगल जंगल वन वन रहे भटकते
उस शक्ति को अब पहचाने,नियम गन और शक्तियां जाने
चिन्तन मनन मन्थन कर पाएं,श्रध्दा से हम शीश झुकायें
सदवुद्धि सदमार्ग पाएं,श्री चरणों मे विनती यही गाएँ
चरण शरण सदा हम मांगे,स्नेह प्रेम वरदान भी चाहें
भूलों की हम करें याचना,हाथ शीश रहे यही प्रर्थना
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