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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
प्रचलित जितने नाम जगत में
मेरे ही असंख्य नाम है प्यारे
मैं सर्वोच्च सकल सृष्टि में
भ्रमित है मानष जन सारे
में जी रचयिता कुल सृष्टि का
रचना जीव जगत नज़ारे
साधु संत गुरु वीर पीर सब
देवी देव भगवान पुकारे
गोल है पृथ्वी स्थिर है फिर भी
दरिया पर्वत सागर वन न्यारे
पठार नदियाँ और मरुस्थल
सजे सुनहरी झीलों के किनारे
कहीं श्वेत दूधिया हिम शैल खण्ड
कहीं सतरंगी जीवन की बहारें
नियमो में बन्धे सारे सौरमण्डल
निश्चित गति दिशा क्रम सब सारे
असंख्य है प्राणी चाहे जगत में
भाषा विवेक मनुष्य हित सारे
गुरुत्व उर्वरा श्रंगार दिया भू को
और अंतरिक्ष में उड्डयन पसारे
उलझ गया मानष अज्ञान अंधेरे
भूले जीवन उद्देश्य फिर सारे
परम शक्ति जड़ नहीं चेतन है
चाहे ज्ञान प्रकाश हो उजाले
एक ही है कर्मफलदाता जो
सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ भवतारे
हे ईश्वर सर्वेश्वर पूर्ण परमेश्वर
रहे चरणों में समर्पित तुम्हारे
🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
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