प्रातः वन्दन जय श्री मदन जी दूर किया अज्ञान तिमिर को,पावन किया सत्य से मन को उलझा प्राणी दैनिक दिनचर्या,नहीं आध्यत्म की परिचर्या करता मनन नहीं ईश्वर का,अज्ञात लक्ष्य रहे जीवन का मानव चोला छोड़ के भी जाना,मृतु के सत्य को निम्न ही माना देख काल को फिर घबराता,आंकलन कर्मो का तब करता करे प्रायश्चित अंत समय वो, रहे पित्त फिर माथा वो तब ही कहा विद्वान जनों ने,समय प्रतीक्षा प्रलय समय मे हर पल उसका ध्यान विचारों,सुबह सांझ नित नाम पुकारो असीम आध्यत्म का सागर गहरा, समय चक्र का उसमें फेरा विपरीत स्तिथि मन भटकाये, तब ईश्वर ही धैर्य बंधाये जो विश्वास करे हृदय से,मिले संग तभी ईश्वर से त्रिकालदर्शी सर्वज्ञ शक्ति, करे जो भी निष्काम की भक्ति अंश उसी का जाग्रत होता,सत्य वोध तब स्वयं का होता असीम शक्ति का सारा पसारा,जैसे किरणों से सूर्य विस्तारा जिसके जैसे संस्कार है होते, निकट प्रिय वो शक्ति के होते शक्ति देती रूप मान्यता,उसी रूप में वो जाना जाता कर्तव्य है उसका दायित्व को जाने, अहम भाव को जितना जाने विनयशीलता रोम रोम हो,त्याग समर्पण और प्रेम हो जब इन गुणों की न्यूनता होती,स्थानों की महत्ता घटती समाज में जितने भी स्थान है,वीर पीर या भगवान है आधार सभी का समर्पण होता,यदि वो आकर्षण मुक्त हो रहता नहीं भटकता यश मान प्रतिष्ठा, रखता यदि वो सच्ची निष्ठा स्वभाव आदते और विचार, बनाते मनोरथ सिध्द आधार करे विचार क्यों जगत में आया,सो जन जीवन सफल बनाया उद्देश्य सहित हम आये धरा पर, सदमार्ग स्वयं निर्धारित कर जिसने सत्य मर्म को पाया,नहीं उलझता फिर वो माया आत्मा मिलन तब ईश को चाहे,अंश जीवात्मा तृप्ति तब पाये सुने आत्मा आवाज़ सदा वो, रहे समर्पित निरन्तर ही हो नेककर्म और सदव्यवहार,रहे सदा जीवन आधार सत्य ज्ञान प्रकाश फैलाएं,जो चाहो हम वो कर पाये दया निधे हे भाग्यविधाता,सर्वोच्च शक्ति कर्मफलदाता करें नमन हम शीश झुकाकर, कृपा दृष्टि रखना करुणाकर नित्य पंखुरी वन्दना गाये, सागर पर्वत तुम्हें ध्यायें गाये प्रातः पवन मतवारी,श्री चरणों मे विनय हमारी मन ये चाहे शरण तुम्हारी, मनोकामना यही हमारी🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏

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