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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
रंग रूप आकर में निश्चित,भौतिक मात्र वह कहलाती
जीवन की आवश्यकताएं,वस्तु मात्र निर्धारित करती
शरीर हमारा भौतिक होता,ईश्वर अंश संचालित करता
शरीर सभी को दिखाई देता,अंश मगर अदृश्य ही रहता
आत्मा चेतना औ तन मिलकर,प्राणी होता है दृष्टिगोचर
आत्माओं को भी श्रेणी होती,विशेषण से सम्बोधित होती
जिसका जैसा स्वभाव संस्कार,और रहे ईश्वर से प्यार
भू जल अग्नि वायु और गगन, आवश्यक मानव के तन
रचना ईश्वर की हरेकआत्मा,महात्मा या परम आत्मा
परम शक्ति है मात्र रचयिता,कर्ता धर्ता यही है हर्ता
शक्ति से ही सृष्टि संचालित, शक्ति सबकुछ करे निर्धारित
शिव शक्ति के भेद को जानो,शक्ति बिना शिव शव ही मानो
शिव शक्ति का भेद ये गहरा, डाला रूप का इस पे पहरा
भोजन वस्त्र तन ये चाहे,आत्मा ईश मिलन को चाहे
तन की भांति आत्मा की आवश्यकता, ईश मिलन तृप्ति पूरकता
मनन भजन पूजा औ सिमरन,आत्मा चाहे चिन्तन दर्शन
जड़ नहीं वह चेतन है,शक्ति का भी अपना एक मन है
राग द्वेष प्यार औ नफरत,करे महसूस शक्ति हर चाहत
असीम शक्ति के रहस्य ये गहरे, हमने पाये पल ये सुनहरे
कोयल कूक पपीहा गाये, भू से नभ शक्ति ही समाये
करूँ वन्दना शीश झुकाऊँ, मन वचन कर्म से तरी हो पाऊँ
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