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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
परम शक्ति सर्वोच्च सृष्टि में,सर्वज्ञ रहे उसकी दृष्टि में
त्रिलादर्शी अन्तर्यामी है,सर्वेश्वर सबके स्वामी हैं
जीव निर्जीव के निर्माता,पूर्ण परमेश्वर भाग्यविधाता
सत्य प्रेम न्याय प्रतीका,कर्मफलदाता ओम सरूपा
अदभुत रूप अलौकिक काया,दशों दिशाएं तुम्हारी माया
भू जल अम्बर तू ही समाया, कण कण व्यापक तेरी काया
निस्वार्थ प्रेम में बन्ध जाते हो,भाव रूप से मिल जाते हो
ज्ञानी तुमको रहें खोजते,वन वन जंगल तुम्हें ढूंढते
सरल प्रीत में विरल सदा ही,तुमको पाने की नहीं कोई विधा ही
जान सका जिसे तुमने जनाया,अपनी इच्छा से अपना बनाया
नहीं रूप पर रूप बनाते,अपने प्रेमी को अहसास कराते
जो जन चले राह तुम्हारी,वो जन तेरा बने पुजारी
काम क्रोध मद लोभ को जीते,दम्भ छोड़ वो तुझपे रीझे
व्यवहार करे औरों से ऐसा,खुद को चाहे औरों से जैसा
सदा करे गुणगान तुम्हारा,भक्त तुम्हे हो सबसे प्यारा
सदा भक्त की लाज बचाते, एक टेर पर दौड़े आते
उचित अनुचित का वोध कराते, कांटों में भी सुमन खिलाते
सबके होते नहीं किसी के,लग्न मगन की तुम् हो गीते
वाणी छोटी गुण का गाऊँ,श्री चरणों मे शीश झुकाऊँ
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