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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
जीव निर्जीव को जिसने बनाया
सकल सृष्टि ही है जिसकी माया
भू से लेकर नीलगगन तक
कण कण में एक वही है समाया
सकल सृष्टि उपकार उसी का
जो परम पिता परमेश्वर है कहाया
मूल आधार जो प्रत्येक जीव का
अंश उसी हर प्राणी में समाया
समझ किसी की कभी न आया
कैसे पर्वत हिम को बनाया
सूखी घास को खाकर गैया ने
हम सबको कैसे दूध पिलाया
भू के अंदर वो विधा कौन सी
जिसने गन्ने में शक्कर घुलवाया
एक कीड़े की लार ने मानव को
रेशम सा अमूल्य वस्त्र पहनाया
कैसे प्रातः कोयलिया गाये
थिरक थिरक के मोर नचाया
कहत कबीर रहीम रसखान औ मीरा
उस ब्रह्म पूर्ण की फैली सब माया
वो सखा सूर का ईसा का ईश्वर
अल्लाह नवी का वाहेगुरु कहलाया
मस्ती सूफी की कलमा कुरान का
गीता के गीतों में वो एक ही गाया
उसी नूर से अस्तित्व हम सबका
प्यार के हर अहसास में जिसे पाया
शब्द रूप नाम से असीम है
सत्य न्याय का प्रतीक कहलाया
कर्मफल दाता भाग्य विधाता
अभेद्य अपार कोई जान न पाया
जाने क्या उद्देश्य जन्म के हम सारे
क्या ईश्वर ने निश्चित करवाया
रहे न भटकन सत्य हम जाने
इच्छा से अपनी हमे वोध कराया
सत्य ज्ञान से किया प्रकाशित
जलराशि वायु में वही तो समाया
रंग बिरंगे सुमन फूलों बूटों में
मेरा स्वामी खुदा ही मुस्काया
श्री चरणों सृष्टि स्वमी के
श्रद्धा प्रेम से मैंने शीश झुकाया
🙏👏🙏👏🙏👏🙏👏🙏
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