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*खुद की भेंट चढ़ाओ*
*अगर भगवान के लिए कुछ करना चाहते हो तो खुद की ही भेंट चढ़ाओ । बहुत पुरानी बात है कहीं पर यज्ञ हो रहा था और उस क्षेत्र का राजा एक बकरे की बली चढ़ाने जा रहा था ।*
*तभी उधर से भगवान बुद्ध गुजरे। उन्होंने उस राजा को कहा - “ठहरो, राजन ! ये क्या कर रहे हो ? इस बेजान बकरे की भेंट क्यों चढ़ा रहे हो ? आखिर किसलिए ?”*
*राजा ने कहा - “इसके चढ़ाने से बहुत पुण्य प्राप्त होगा ।”*
*बुद्ध बोले - “यदि ऐसी बात है तो मुझे भेंट चढ़ा दो, इससे भी ज़्यादा पुण्य मिलेगा ।”*
*यह सुनकर राजा थोड़ा डरा । क्योंकि बकरे की बली चढ़ाने में कोई हर्ज़ा नहीं था, लेकिन बुद्ध की बली चढ़ाने की बात मन में आते ही राजा कांप गए।*
*बुद्ध ने कहा - “अगर सच में ही कोई बहुत बड़ा लाभ करना हो तो अपने को ही चढ़ा दो, बकरा चढ़ाने से क्या होगा ?"*
*राजा ने कहा - “अरे, नहीं महाराज! बकरे का क्या नुकसान होगा ? बल्कि यह तो स्वर्ग चला जाएगा ।”*
*बुद्ध बोले - “यह तो बहुत ही अच्छा है, मैं स्वर्ग की तलाश कर रहा हूँ, तुम मुझे बली चढ़ा दो और मुझे स्वर्ग भेज दो और ऐसा क्यों नहीं करते कि तुम अपने माता-पिता को ही स्वर्ग भेज दो या फिर खुद को क्यों रोके हुए हो ? जब स्वर्ग जाने की ऐसी सरल व सुगम तरकीब मिल गई है तो काट लो गर्दन, अपनी। इस बेचारे बेजान बकरे को क्यों भेज रहे हो, स्वर्ग में ? जो शायद स्वर्ग में जाना भी ना चाहता हो ? बकरे को खुद ही चुनने दो कि उसे कहाँ जाना है ?" उस राजा को बुद्ध की बात समझ में आ गयी।*
*फूल भी यदि तुमने भगवान के चरणों में चढ़ाये हैं तो कौन सा बड़ा कार्य कर दिया ? पेड़-पौधों के ऊपर खिलते हुए फूलों की सुगन्ध उस विराट भगवान के चरणों में ही तो जा रही है और वह सुगन्ध कहाँ जा रही है ? लेकिन तुमने उन फूलों को वृक्षों से तोड़कर मुर्दा कर दिया और फिर मुर्दा फूलों को जाकर मन्दिर में चढ़ा आए और समझ रहे हो कि बहुत बड़ा काम कर आए हो । कभी तुम मन्दिर में धूप-दीप जला रहे हो तो कभी जानवरों की भेंट चढ़ा रहे हो और कभी किसी अन्य इन्सान की भी भेंट चढ़ा रहे हो। लेकिन अपने आपको कब चढ़ाओगे ? और जो अपने आपको चढ़ाता है, वही उसे पाता है।*
*सच तो यही है अगर भगवान के लिए कुछ करना चाहते हो तो खुद को ही भेंट चढ़ाओ । खुद को, अपने मन को, अपने तन को और फिर सामर्थ्य अनुसार अपने धन को भेंट चढ़ाओ। यही जीवन का सत्य है।*
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