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प्रातः वन्दन
जय श्री मदन जी
अनादि औ अनन्त है,माया में बेअंत है,कण कण जो बसे सर्वशक्तिमान है।।
रूप से है मुक्त जो,नाम है संयुक्त जो ,सर्वज्ञ सर्वोच्च, कृपानिधान है।।
ज्ञान का स्रोत जो,सत्य प्रेम न्याय जो, पूज्य मात्र सृष्टि में करते कल्याण है।।
नर नहीं नारी नहीं,सर्वरूप धारी भी, अमृत वाणी से जो देती हमें ज्ञान है।।
एक मात्र कर्ता है,हर्ता और धर्ता है कर्मफल देनेवाला तू ही दयावान है।।
सृष्टि का तू सार है ,प्राणों का आधार है,भक्तों का जो नाम करे देता यश मान है।।
ईश्वर को जाने माने,खुद को वो पहचाने,आया क्यों जग में ,करता क्या काम है।।
वाणी जिसकी मृदु हो,भाषा जिसकी मधु हो करे सदव्यवहार और नेककाम है।।
मनुष्य के कर्म का, सत्य निष्ठ धर्म का,करता जो आंकलन,अंश तेरा विद्यमान है।।
एक करुँ प्रार्थना,चरणों मेंवन्दना, रखना शरण निज माँगू वरदान है।।
गुण गाऊँ तेरा सदा,मन भजे नाम सदावुद्धि को निर्मल कर, देना अपना भान है।।
सिमरन श्वांस हो,आशा और विश्वास हो ,मेरा ये अस्तित्व प्रभु दिया तेरा दान है।।
मन भ्रम मुक्त हो,नहीं अहम से युक्त हो,श्रध्दा मन मेरे हो रहे नैन रूप नाम है।।
रहे मन में आभार मेरे,स्वामी सखा साथी मेरे,जीवन में मेरे, तेरा प्रथम स्थान है।।
जैसा चाहो कर पाऊँ,प्यार सदा तेरा पाऊँ,करूँ गुणगान तेरा, तुझे प्रणाम है।।
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